
ह्नुमन एंगल को लोगो लगेगा
फोटो आरटी-1381-छोटे भाई दविंदरपालसिंह के साथ अपना घर आश्रम से पंजाब जाते हुए।
रतलाम. एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि जहां उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, वहां नि:स्वार्थ सेवा का दीया एक नई रोशनी बिखेर सकता है। मानवता, संवेदना और नि:स्वार्थ सेवा का एक अनुपम उदाहरण शहर के 'अपना घर आश्रम' देखने को मिला। आश्रम के अथक प्रयासों से पंजाब निवासी कमलजीत सिंह, जो पिछले दो वर्षों से अपने परिवार से बिछडकऱ दर-दर भटक रहे थे, आखिरकार परिजनों से सुरक्षित मिल गए।
देशभर में फैली 'अपना घर आश्रम' की शाखाएं केवल बेसहारा लोगों को आश्रय नहीं देतीं, बल्कि मानवता का पवित्र मंदिर हैं। आश्रम की विशेषता है कि यहां आने वाले हर बेघर, मानसिक रूप से अस्वस्थ या लावारिस व्यक्ति को पीडि़त नहीं, बल्कि 'प्रभु' (ईश्वर का रूप) मानकर सेवा की जाती है। आश्रम के सेवादार नि:शुल्क चिकित्सा, देखभाल, संवेदना और काउंसलिंग के साथ भटके बेसहारा लोगों का पारिवारिक पुनर्मिलन करवाते हैं।
घर वापसी तक की भावुक कहानी
लगभग ढाई महीने पहले रतलाम के पास सागोद गांव में कमलजीत सिंह असहाय और दयनीय स्थिति में भटकते पाए गए थे। ग्रामीणों की सूचना पर आश्रम की टीम ने तुरंत पहुंचकर उन्हें रेस्क्यू किया और आश्रम लाया गया। आश्रम के सेवादारों के प्रेम, देखरेख और चिकित्सा टीम के सतत प्रयास से कमलजीत की स्थिति में सुधार आया। निरंतर काउंसलिंग के बाद उन्होंने पंजाब में रहने वाले अपने परिवार का पता बताया।
आंसू और अपनों का मिलना
दो साल बाद जब आश्रम ने फोन पर कमलजीत सिंह की बात उनकी पत्नी, छोटे बच्चों और वृद्ध पिता से करवाई, तो पूरा माहौल भावुक हो उठा। पंजाब से उनके छोटे भाई दविंदरपाल सिंह रतलाम पहुंचे। दो साल बाद भाई को सही-सलामत देखकर वे आश्रम प्रबंधन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए रो पड़े। सभी औपचारिकताओं के बाद कमलजीत को पंजाब विदा किया गया।
समर्पित टीम
इस मानवीय मिशन में इंदौर मानसिक चिकित्सालय के नर्सिंग ऑफिसर जितेन्द्र कुमार सुमन तथा रतलाम मेडिकल कॉलेज के डॉ. गौरव एवं डॉ. कपिल आर्य का विशेष चिकित्सीय योगदान रहा। आश्रम के निस्वार्थ सेवादारों और चिकित्सा विशेषज्ञों के तालमेल से ही यह चमत्कार संभव हो सका।
अब तक 87 बिछड़े 'प्रभु जनों' की हो चुकी है घर वापसी
अपना घर आश्रम, रतलाम अपनी स्थापना के बाद से अब तक 87 असहाय और भटके हुए प्रभु जनों को उनके परिवारों से पुनर्मिलन करा चुका है। यह आंकड़ा केवल एक संख्या नहीं, बल्कि 87 उजड़े हुए परिवारों में फिर से लौटी खुशियों का प्रमाण है।