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जावरा पेज की बाटम- भारत की परंपरा इदं न मम पर आधारित, संकट में मदद का भाव ही सच्ची राष्ट्रसेवा

रतलाम

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Newsdesk

Aug 14, 2026

datia news

datia news (भाई ने की भाई की हत्या Photo Source- Patrika)

फोटो-आरटी-1402-विकास शेहवाल
गेस्ट राइटर संवाद से समाधान में पारंगत है।


रतलाम। स्वतंत्रता दिवस केवल आजादी का उत्सव नहीं, अपनी सामूहिक चेतना को आईना दिखाने का अवसर भी है। भारत की पहचान केवल उसकी प्राचीन सभ्यता, ज्ञान और संस्कृति से नहीं रही, बल्कि उसके देने के भाव से रही है। हमारी परंपरा ने हमें सिखाया इदं न मम अर्थात यह केवल मेरा नहीं है। सर्वे भवन्तु सुखिन और वसुधैव कुटुम्बकम् जैसे विचार केवल श्लोक नहीं, हमारे सामाजिक जीवन की आधार भूमि रहे हैं।
ज्ञान देना हो, सेवा करनी हो, अतिथि का सत्कार करना हो या संकट में किसी के साथ खड़ा होना—भारतीय समाज ने लंबे समय तक अपने सामर्थ्य को केवल अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए भी उपयोग किया है।
लेकिन आज जब छोटी-सी आपदा आती है, तो कई बार हमारी तस्वीर बदलती दिखाई देती है। गैस सिलेंडरों की जमाखोरी हो, अनाज की कृत्रिम कमी पैदा करना हो या कोरोना जैसी आपदा में आवश्यक दवाओं और वस्तुओं की कालाबाजारी, ऐसी घटनाएं हमें केवल व्यवस्था पर सवाल उठाने के लिए नहीं, अपने भीतर झांकने के लिए भी मजबूर करती हैं।


सवाल यह नहीं है कि सरकार क्या कर रही है। सवाल यह भी है कि मैं क्या कर रहा हूं? किसी संकट के समय यदि मेरे पास आवश्यकता से अधिक है और सामने वाला जरूरतमंद है, तो मेरी पहली प्रवृत्ति क्या होनी चाहिए, लाभ कमाने की या मदद करने की? यही प्रश्न हमारी संस्कृति और हमारी वर्तमान मानसिकता के बीच का अंतर दिखाता है। हम अक्सर कहते हैं कि देश बदलना चाहिए। लेकिन समाज व्यक्तियों से बनता है और व्यक्ति अपने विचारों से। विचार बदलेंगे तो व्यवहार बदलेगा और व्यवहार बदलेगा तो व्यवस्था भी बदलने लगेगी।
हमारे स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। कितने ही लोगों ने अपनी संपत्ति, सुख, प्रतिष्ठा, परिवार और यहां तक कि अपना जीवन तक राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया। उन्होंने यह नहीं पूछा कि मुझे इससे क्या मिलेगा? उन्होंने पूछा-मैं देश को क्या दे सकता हूं?

मनुष्यों को असाधारण बनाया
यही वह विचार था जिसने सामान्य मनुष्यों को असाधारण बना दिया। आज आवश्यकता उसी विचार को अपने दैनिक जीवन में वापस लाने की है। देशभक्ति केवल तिरंगा लगाने या राष्ट्रगान गाने तक सीमित नहीं हो सकती। यदि संकट में हम किसी की मदद करते हैं, किसी जरूरतमंद का शोषण नहीं करते, अपने पास उपलब्ध संसाधन का अनुचित लाभ नहीं उठाते और ईमानदारी को परिस्थितियों के अनुसार नहीं बदलते—तो यह भी राष्ट्रसेवा ही है। और इसके लिए सबसे पहले हमें अपने विचारों का प्रबंधन करना होगा, क्योंकि हर गलत व्यवहार से पहले एक विचार जन्म लेता है, मुझे अपना फायदा देखना है, और हर महान कार्य से पहले भी एक विचार जन्म लेता है मेरे कारण किसी का भला हो सकता है।


चुनाव हमारे हाथ में है



इस स्वतंत्रता दिवस पर शायद हमें केवल यह याद करने की आवश्यकता नहीं कि हमारे पूर्वजों ने देश को स्वतंत्र कैसे कराया, बल्कि यह भी सोचने की आवश्यकता है कि हम अपनी स्वार्थपूर्ण सोच से स्वयं को कितना स्वतंत्र कर पाए हैं। भारत ने दुनिया को ज्ञान दिया, दर्शन दिया, चिकित्सा और विज्ञान की परंपराएं दीं और सबसे बढ़कर मानवता को जोड़ने का विचार दिया। अब समय है कि हम उस विरासत को केवल इतिहास की किताबों में न खोजें, बल्कि अपने आचरण में उतारें। जिस दिन हमारा मैं थोड़ा छोटा और हम थोड़ा बड़ा हो जाएगा, उसी दिन भारत की उस गौरवशाली परंपरा का पुनर्जागरण शुरू हो जाएगा, जिसके लिए दुनिया हमें केवल एक देश नहीं, बल्कि एक विचार के रूप में देखती रही है।




भीतर छिपी महानता

एमर्सन ने द ओवर सोल में कहा है कि मनुष्य केवल उसका शरीर, काम और बाहरी व्यवहार नहीं है। उसके भीतर ज्ञान, अच्छाई और एक ऐसी आत्मिक शक्ति भी है, जो उसे महान बना सकती है। जब मनुष्य अपने भीतर के इन श्रेष्ठ गुणों को अपने आचरण में उतारता है, तो उसका व्यक्तित्व इतना प्रभावशाली हो जाता है कि लोग स्वतः उसके सामने सम्मान से झुकते हैं। मनुष्य की असली पहचान उसके बाहरी रूप में नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपी उस महान चेतना में है, जिसे वह अपने कर्मों से प्रकट करता है।