समय के साथ हर संस्कृति और परम्पराओं में काफी बदलाव आया है, लेकिन सिलावट समाज आज भी 250 वर्षों से अधिक प्राचीन परम्परा सामूहिक रूप से संगठित होकर निभाता आ रहा है। जिसकी शुरुआत रंग तेरस से होकर सामूहिक गोठ के समाप्त होती। समाज के व्यक्ति अधिकांश सिलावटी कार्य करते है, नौकरी 5-10 और व्यवसाय में भी इतने ही प्रतिशत लोग जुड़े होंगे। बाकि सभी अपना परम्परागत काम करते है।
ये कहना है सिलावट समाज के अध्यक्ष मोहनलाल सिलावट, सामूहिक विवाह समिति अध्यक्ष सुरेश धमानिया व कोषाध्यक्ष भेरूलाल मरमट का। समाजजनों ने पत्रिका के मेरा शहर मेरा समाज कॉलम के अन्तर्गत अपनी सामाजिक गतिविधियों से रूबरू कराते हुए बताया कि परम्परा में अब भी रंग तेरस पर रंग बरसता, सेंव बंटती, शरबत संग चंटिये खेले जाते है और सामूहिक गोठ में समाजजन एक होते है। अमावस्या पर दोनों मंदिर पर भजन-कीर्तन बरसों से होते आ रहे हैंं।
जिनके पालक नहीं उनका समाज
सिलावट ने बताया कि समाज में पिछले 24 सालों से सामूहिक विवाह होते आ रहे हैं, गरीब वर्ग और जिनके माता-पिता नहीं है उनका समाज की और से सामूहिक विवाह में नि:शुल्क विवाह करवाया जाता है। समाज के प्रतिभावान विद्यार्थियों को समय-समय पर पुरस्कृत किया जाता है। साथ ही जरूरतमंद-विधवा महिलाओं को समाज की और से सिलाई मशीन उपलब्ध कराई जाती है, ताकि वे इस पर कार्यकर अपना भरण पोषण कर सके। समाज के रतलाम में 500 से अधिक परिवार निवास करते हैं और 2500 से अधिक सदस्यगण होंगे।