
फोटो-आरटी-2602-डॉ राकेश कुमावत
पत्रिका साक्षात्कार का लोगो रहेगा
रतलाम। नीट-यूजी को लेकर परीक्षा व्यवस्था, पारदर्शिता और परिणामों से जुड़े सवालों ने विद्यार्थियों और अभिभावकों के बीच चिंता बढ़ाई है। दिल्ली के जंतर-मंतर सहित विभिन्न स्थानों पर विद्यार्थियों के विरोध-प्रदर्शन और परीक्षा प्रणाली में सुधार की मांग ने इस बहस को और व्यापक बनाया है। हाल के घटनाक्रमों के बीच सुप्रीम कोर्ट ने भी परीक्षा व्यवस्था में सुधार और शिकायतों से जुड़े मामलों को गंभीरता से लिया है।
ऐसे माहौल में सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या इन विवादों का असर नीट की तैयारी कर रहे विद्यार्थियों के भविष्य पर पड़ना चाहिए? क्या छोटे शहरों के विद्यार्थी राष्ट्रीय स्तर की इस प्रतिस्पर्धा में सफल हो सकते हैं? क्या महंगी कोचिंग के बिना मेडिकल प्रवेश की तैयारी संभव है? इन्हीं सवालों पर अभ्यास कॅरियर इंस्टीट्यूट के निदेशक डॉ. राकेश कुमावत से पत्रिका ने लंबी बात की, प्रस्तुत है संपादित अंश।
पत्रिका : नीट को लेकर लगातार विवाद के बीच विद्यार्थियों को क्या करना चाहिए?
डॉ. कुमावत : विद्यार्थियों और अभिभावकों को सबसे पहले यह समझना चाहिए कि परीक्षा व्यवस्था से जुड़े विवाद और किसी विद्यार्थी का व्यक्तिगत कॅरियर दो अलग विषय हैं। विद्यार्थियों को अपुष्ट सोशल मीडिया पोस्ट या अफवाहों के आधार पर अपने करियर का फैसला नहीं करना चाहिए।
पत्रिका : मौजूदा माहौल में विद्यार्थियों के मन में डर होना स्वाभाविक है?
जवाब : हां, चिंता होना स्वाभाविक है। विद्यार्थी को यह सोचने के बजाय कि प्रतियोगिता बहुत कठिन है, यह देखना चाहिए कि उसकी अपनी तैयारी कहां खड़ी है। कौन-से विषय मजबूत हैं, कहां गलतियां हो रही हैं, टेस्ट में समय कितना लग रहा है और कमजोर अध्यायों को कैसे सुधारा जा सकता है।
पत्रिका : छोटे शहर का विद्यार्थी कड़ा मुकाबला कर सकता है?
डॉ कुमावत : बिल्कुल कर सकता है। प्रतियोगी परीक्षा में शहर से ज्यादा महत्व तैयारी की गुणवत्ता और निरंतरता का है। छोटे शहरों में संसाधनों की उपलब्धता पहले की तुलना में काफी बढ़ी है। ऑनलाइन अध्ययन सामग्री, टेस्ट सीरीज और डिजिटल संसाधनों ने विद्यार्थियों के सामने अवसर बढ़ाए हैं।
पत्रिका : अभिभावक बच्चों पर दबाव डालते हैं, उससे कैसे बचा जा सकता है?
डॉ कुमावत : कई बार अभिभावक अच्छे भविष्य की चिंता में अनजाने में बच्चे पर बहुत अधिक दबाव डाल देते हैं। बार-बार अंक पूछना, दूसरे बच्चों से तुलना करना या यह कहना कि हर हाल में डॉक्टर ही बनना है विद्यार्थी का तनाव बढ़ा सकता है। इसके बजाय अभिभावकों को बच्चे की मेहनत और सुधार पर ध्यान देना चाहिए। उन्हें यह संदेश देना चाहिए कि लक्ष्य महत्वपूर्ण है, लेकिन रास्ते में आने वाली कठिनाइयों से घबराने की जरूरत नहीं है। माता-पिता का विश्वास विद्यार्थी के आत्मविश्वास को मजबूत करता है।
पत्रिका : NEET की तैयारी कब से शुरू करना जरूरी है?
डॉ कुमावत : शुरुआती कक्षाओं में नीट की सीधी तैयारी करने के बजाय विज्ञान और गणित जैसे विषयों की बुनियादी समझ मजबूत करना अधिक उपयोगी है। 11वीं और 12वीं में विद्यार्थी को नीट के पाठ्यक्रम और परीक्षा पैटर्न के अनुरूप गंभीर तैयारी करनी चाहिए।