
प्राचीन भारतीय वांग्मय में सम्यक विशेषण उस वस्तु या गुण को दिया गया है जो तर्कसंगत, न्यायोचित और वास्तविक हो। सम्यक सुख से आशय मन की उस स्थिति से है जिसके बाद व्यक्ति के मन का भटकाव समाप्त हो जाता है। वर्धमान महावीर ने भी सुख मन की उसी स्थिति को कहा है, जो तमाम कामनाओं को जीत लेती है। कामनाओं को जीत पाना मनुष्य के लिए इतना आसान नहीं है।
मन की इच्छाओं पर पूर्ण नियंत्रण
श्रीमद्भगवत्गीता के दूसरे अध्याय में कहा गया है कि हमारा परंपरागत दर्शन जीवन में संयम की साधना पर अत्यधिक बल देता है। संयम अर्थात इंद्रियों की चेष्टा और मन की इच्छाओं पर नियंत्रण। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा है,‘आसक्ति का नाश न होने के कारण ये प्रमथन स्वभाव वाली इंद्रियां यत्न करते हुए बुद्धिमान मनुष्य के मन को भी जबरन हर लेती हैं। विषयों का चिंतन करने वाले मनुष्य की उन विषयों में आसक्ति हो जाती है, आसक्ति से उन विषयों की कामना उत्पन्न होती है और कामना में विघ्न पडऩे से क्रोध उत्पन्न होता है। क्रोध से अत्यंत मूढ़ता भाव उत्पन्न हो जाता है, और मनुष्य अपनी स्थिति से गिर जाता है।’
वरदान भी बन सकता है अभिशाप
एक व्यक्ति को किसी बादशाह ने कह दिया कि जितनी धरती चाहे अपने पांवों से नाप ले। वह सारी उसकी हो जाएगी। ज्यादा से ज्यादा धरती हथियाने की कोशिश में वह व्यक्ति कड़ी धूप में भूखा-प्यासा इतना आगे चला गया कि शाम तक अपने प्रस्थान बिन्दु पर लौट कर आना उसके लिए मुश्किल हो गया। जब सूरज ढलने लगा, तब उसमें लौटने की चेतना जागृत हुई। बदहवासी में वह दौड़ा लेकिन उसने रास्ते में ही दम तोड़ दिया। व्यक्ति को अपनी इच्छाओं पर संयम का नियंत्रण रखना चाहिए अन्यथा वरदान भी उसके लिए अभिशाप हो सकते हैं।
संयमपूर्ण जीवन सफलता का आधार
पं चतंत्र की एक प्रसिद्ध कथा है। एक बार एक कछुए और खरगोश में तेज दौडऩे का मुकाबला हुआ। खरगोश की तुलना में कछुए की गति कम थी लेकिन वह अनुशासनपूर्वक लगातार मंजिल की दिशा में चलता रहा जबकि खरगोश अहंकार में आकर यह सोच की बीच रास्ते में सो गया कि जब तक कछुआ आएगा तब तक वह फिर तेजी से दौडक़र मुकाबला जीत लेगा। उसकी नींद खुलने तक कछुआ मंजिल पर पहुंच चुका था। कछुआ अपनी कम गति के कारण अवसाद में नहीं आया। उसने धैर्य बनाए रखा और संयमपूर्वक अपना कर्म करता रहा। यही सूत्र जीवन में उसकी सफलता का सूत्रधार बना।
वाणी का संयम ही जीवन में देता सुखों का आधार
इंद्रियों के संयम को जीवन की सफलता का प्रमुख साधना कहा है। नारद उपदेश देते हुए कहते हैं। इंद्रियों का आवश्यक कर्मों को संपन्न करने में कम से कम उपयोग करना चाहिए। वाणी पर संयम करने वाला किसी की निंदा के पाप, कटु वचन बोलकर शत्रु बनाने की आशंका, अभिमान जैसे दोषों से बचा रहता है। एक बार बुद्ध मौन व्रत का पालन करते समय एकाग्रचित बैठे हुए थे। उनसे द्वेष रखने वाला एक कुटिल व्यक्ति उधर से गुजरा। उसके मन में ईष्र्या भाव पनपा। उसने वृक्ष के पास खड़े होकर बुद्ध के प्रति अपशब्दों का उच्चारण किया। बुद्ध मौन रहे। उन्हें शांत देखकर वह वापस लौट आया। रास्ते में उसकी अंतरात्मा ने उसे धिक्कारा। एक शांत बैठे साधु को गाली देने से क्या मिला? वह दूसरे दिन पुन: बुद्ध के पास पहुंचा। हाथ जोडक़र बोला, ‘मैं कल अपने द्वारा किए गए व्यवहार के लिए क्षमा मांगता हूं।’ बुद्ध ने कहा, ‘कल जो मैं था, आज मैं वैसा नहीं हूं। तुम भी वैसे नहीं हो। क्योंकि जीवन प्रतिफल बीत रहा है। नदी के एक ही पानी में दोबारा नहीं उतरा जा सकता। जब वापस उतरते हैं, वह पानी बहकर आगे चला जाता है। कल तुमने क्या कहा, मुझे नहीं मालूम। और जब मैंने कुछ सुना ही नहीं, तो वे शब्द तुम्हारे पास वापस लौट गए।’ बुद्ध के शब्दों ने उसे सहज ही वाणी के संयम का महत्व बता दिया।
संयम के पूर्ण प्रतिमान हैं राजा हरिशचंद्र
म हाराजा हरिशचंद्र की कहानी है। सत्य के प्रति निष्ठावान महाराजा हरिश्चंद्र ने तमाम प्रतिकूलताओं के बावजूद धैर्य का परित्याग नहीं किया। संयम बनाए रखने के लिए ही इतिहास ने उन्हें अद्भुत यश से अभिषिक्त किया। प्रतिकूल परिस्थितियों में मन, वचन, काया और कर्म की उद्विग्नता पर विजय पाते हुए सामाजिक मर्यादाओं का पालन करना ही संयम है। इसे धैर्य या संतोष कहा जाता है।
एक पुरानी मान्यता है कि गाय, घोड़ों, हाथी या अपरिमित संपदा के धन का महत्व भी उस व्यक्ति के सुख के सम्मुख धूल समान है जिसके पास संतोष का धन है। इसी संतोष ने महाभारत के युद्ध में अर्जुन की विजय की प्रस्तावना लिखी थी। युद्ध प्रारंभ होने के पहले दुर्योधन और अर्जुन दोनों ही द्वारकापति श्रीकृष्ण के पास सहायता मांगने गए। दुर्योधन ने श्रीकृष्ण की अक्षोहिणी सेना मांगी लेकिन अर्जुन ने श्रीकृष्ण के साथ से ही संतोष कर लिया, वह भी तब जबकि श्रीकृष्ण ने युद्ध में किसी भी प्रकार का अस्त्र या शस्त्र हाथ में नहीं लेने का प्रण कर लिया था। सब जानते हैं कि महाभारत के युद्ध में पांडवों के मूल में श्रीकृष्ण की ही प्रखर प्रज्ञा थी- वरना तो योद्धा दुर्योधन के पक्ष में लडऩे वाले भी कमजोर नहीं थे।
- अतुल कनक