Namokar mantra benefits : भारतीय परंपरा में मंगल विन्यास का उद्देश्य है—इष्ट की प्राप्ति। यह शुभारंभ की वह विधि है, जिसमें ग्रंथकार देवता और गुरु को स्मरण कर ग्रंथ को पवित्रता और शक्ति से युक्त करते हैं।
Spiritual benefits of Mangal Vinyas : भारतीय परंपरा में मंगल विन्यास का उद्देश्य इष्ट की प्राप्ति है। ग्रंथकार अपने देवता और गुरु को नमस्कार के रूप में मंगल की स्मृति से ग्रंथ का शुभारंभ करते हैं। यह प्रक्रिया शास्त्र को अलंकृत करती है और उसे कल्याणकारी बनाती है। जैन दशवैकालिक सूत्र का पहला वाक्य ‘धम्मो मंगलमुक्किठ्ठं’ कहता है, जिसका अर्थ है कि धर्म उत्कृष्ट मंगल है। यह मंगल विन्यास (Mangal Vinyas) भारतीय धार्मिक साहित्य में शुभता का प्रतीक है, जो ग्रंथ को पवित्रता और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है। विशेष रूप से जैन परंपरा में, मंगल विन्यास का गहरा महत्त्व है, जो ग्रंथ की शुरुआत के साथ-साथ आत्मिक उन्नति का आधार बनता है।
जैन धर्म में मंगल विन्यास का सबसे प्रमुख स्वरूप नमस्कार महामंत्र है, जिसे आदि मंगल माना जाता है। यह कार्यसिद्धि में सहायक होने के कारण ‘महामंत्र’ कहलाता है। भगवती सूत्र में इसका स्वरूप इस प्रकार है- ‘नमो अरहंताणं, नमो सिद्धाणं, नमो आयरियाणं, नमो उवज्झायाणं, नमो सव्वसाहूणं,’ अर्थात् अर्हंतों, सिद्धों, आचार्यों, उपाध्यायों और समस्त साधुओं को नमस्कार। प्राकृत भाषा में इसे ‘नवकार’ कहते हैं, जो गुण-पूजा का सूत्र है, न कि व्यक्ति पूजा का।
आवश्यक सूत्र में इसे ‘नमो लोए सव्वसाहूणं’ कहा गया है, और एक पद्य जोड़ा गया-‘एसो पंच नमुक्कारो, सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणं च सव्वेसि, पढमं हवइ मंगलं,’ अर्थात् ये पांच नमस्कार पापों को नष्ट करने वाले और सभी मंगलों में प्रथम हैं। यह मंगल विन्यास आध्यात्मिक शुद्धि और शुभता का प्रतीक है।
ऐतिहासिक रूप से, मंगल विन्यास (Mangal Vinyas) का प्रयोग ईसा पूर्व पहली शताब्दी के आसपास प्रचलित हुआ। श्वेतांबर परंपरा में भगवती सूत्र को छोडक़र अन्य प्राचीन अंग-सूत्रों के आरंभ में मंगल विन्यास नहीं मिलता, लेकिन बाद के ग्रंथों जैसे आवश्यक सूत्र, दशवैकालिक, उत्तराध्ययन और पिण्डनिर्युक्ति में इसका प्रयोग हुआ। आचार्य महाप्रज्ञ के अनुसार, प्राचीन आगम साहित्य में मंगल विन्यास की पद्धति नहीं थी। उत्तरकाल में यह परंपरा विकसित हुई, जब शिष्य पहले पंच नमस्कार करते थे, फिर आचार्य उनकी योग्यता के अनुसार सूत्रों की वाचना करते थे। आचार्य देवेंद्रमुनि कहते हैं कि आगम स्वयं मंगल स्वरूप हैं, इसलिए मंगलवाक्य अनिवार्य नहीं था। आचार्य वीरसेन और जिनसेन ने ‘जयधवला टीका’ में लिखा कि आगम में मंगलवाक्य का नियम नहीं है, क्योंकि ध्यान से ही मंगल फल प्राप्त होता है।
प्रज्ञापना में मंगल गाथाएं सिद्ध से शुरू होती हैं, जबकि पंचनमस्कार में अर्हंत पहले हैं, क्योंकि वे प्रत्यक्ष उपकारी हैं। ईसा पूर्व दूसरी शताब्दी के हाथीगुम्फा शिलालेख में ‘नमो अरहतानं, नमो सव्व सिधानं’ अंकित है, जो इसकी प्राचीनता को प्रमाणित करता है। दिगंबर परंपरा में धवला के अनुसार, यह आचार्य पुष्पदंत की रचना है, जहां ‘णमो अरहंताणं’प्रयोग हुआ।
णमो अरहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो सव्वसाहूणं
यह मंगल विन्यास जीवन में शांति और कल्याण का आधार है।-
डॉ. महावीर राज गेलड़ा
संस्थापक कुलपति
जैन विश्व भारती इंस्टीट्यूट लाडनूं