New Year 2026: नए साल की शुरुआत होते ही सबदूर हिंदू नववर्ष ट्रेंड कर रहा है। इस लेख में पढ़िए, इसकी वजह और विक्रम संवत कब मनाया जाता है और क्यों?
Hindu New Year 2026 Kab Hai: अंग्रेजी नववर्ष 2026 की शुरुआत होते ही एक्स (पूर्व में ट्वीटर) पर और दूसरे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर हिंदू नववर्ष 2026 ट्रेंड करने लगा है। इस आर्टिकल में आपको बताएंगे कि, आज हिंदू नववर्ष की इतनी चर्चा क्यों हो रही है? और 2026 में यह कब है?
दरअसल, आज (1 January 2026) ग्रेगोरियन कैलेंडर (Gregorian Calendar) के अनुसार 2026 की शुरुआत हो रही है। ऐसे में सभी इस नए साल का स्वागत कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर भी बधाईयों का दौर चल रहा है। ऐसे में 2026 के शुरु होते ही हिंदू नववर्ष 2083 की चर्चाएं क्यों तेज हो गईं?
बता दें कि आज नए साल 2026 के पहले दिन जब कुछ लोग इसका स्वागत कर रहे हैं, तो कुछ अपने नववर्ष (विक्रम संवत) को याद कर रहे हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स के अनुसार, लोग कह रहे हैं कि नववर्ष की शुरुआत हिंदू नववर्ष से मानी जानी चाहिए, आज नहीं। लोगों का कहना है कि, हमें अपनी संस्कृति और गौरवशाली इतिहास को हमेशा याद रखना चाहिए। हम इस न्यू ईयर से लगभग 57 साल आगे है। हम नया साल तभी मनाएंगे।
हिंदू नववर्ष, चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से शुरू होता है। यह अंग्रेजी कैलेंडर से लगभग 57 साल आगे चलता है। 2026 में यह 19 मार्च, गुरुवार के दिन आएगा। इसी दिन से हिंदू नववर्ष यानी विक्रम संवत् 2083 की शुरुआत होगी। बता दें कि, नेपाल में हिंदू कैलेंडर विक्रम संवत, आधिकारिक कैलेंडर है। यहां सभी सरकारी और प्रशासनिक काम इसी के अनुसार होते हैं।
ये सभी त्यौहार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा (पहली तिथि) से शुरू होते हैं और सृष्टि के प्रारंभ और नई शुरुआत का प्रतीक माने जाते हैं। सभी राज्यों में इसे अलग-अलग नाम से मनाया जाता है।
महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना: गुड़ी पड़वा, उगादि (युगादि)
उत्तर भारत (दिल्ली, यूपी, राजस्थान): चैत्र नवरात्रि, नवसंवत्सर
पंजाब, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश: बैसाखी (वैशाख)
असम: बोहाग बिहू (रोंगली बिहू)
तमिलनाडु: पुथांडु (पुथंडु पिरप्पु)
केरल: विशु
सिंधु समुदाय: चेटी चंड (चेती चंडी)
जम्मू-कश्मीर: नवरेह
पश्चिम बंगाल (बंगाली नववर्ष): पोइला बैशाख (वैशाख माह में)
हिंदू नववर्ष यानी विक्रम संवत की शुरुआत 57 ईसा पूर्व (BCE) में उज्जैन के राजा विक्रमादित्य ने की थी। शकों (ईरानी शासकों) पर विजय प्राप्त करने के बाद उन्होंने अपनी जीत और शासनकाल के प्रारंभ के प्रतीक के रूप में इसे शुरु किया था।