गणपति पूजा में न भूलें इस चीज को चढ़ाना और भूलकर भी न चढ़ाएं ये दूसरी चीज
सागर.गुरुवार से गणेश चतुर्थी के शुभारंभ के साथ ही घर-घर श्रीगणेश की स्थापना हो रही हैकिसी भी शुभ कार्य से पहले हम हमेशा गणपति जी की पूजा करते हैं, चाहे वो विवाह हो, नामकरण हो, गृह प्रवेश हो या फिर दीवाली का त्योहार ही क्यों न हो। गणेश चतुर्थी से शुरू होने वाले 10 दिन के गणेश उत्सव में तो गणपति जी की पूजा और भी जोर शोर से होती है। अगर पूजा पूरे विधि विधान से हो, तब ही उसका असली आनंद आता है और सही फल मिलता है।
वैसे तो गणपति जी की पूजा में कई चीज़े चढ़ाई जाती हैं, लेकिन उनकी पूजा में "दूर्वा" यानी कि घास का चढ़ाना बहुत ज़रूरी है। इसके बिना पूजा अधूरी मानी जाती है क्योंकि भगवान गणेश को दूर्वा बहुत ही प्रिय है। इसके पीछे एक कहानी जुड़ी है। पुराणों के अनुसार अनलासुर नामक असुर ने स्वर्ग से लेकर पृथ्वी तक आतंक फैला रखा था। वह ऋषि मुनियों और आम आदमियों को ज़िंदा ही खा जाया करता था। सभी देवता उससे पीछा छुड़ाने के लिए भगवान शिव के पास कैलाश पहुंचे। शिव जी ने कहा कि इस असुर का नाश केवल गणेश जी ही कर सकते हैं। फिर गणेश जी ने अनलासुर को निगल लिया। इससे उनके पेट में बहुत जलन होने लगी। तब कश्यप ऋषि ने दूर्वा की 21 गांठ बना के उनको खाने के लिए दी, जिससे उनके पेट की जलन शांत हुई। और तभी से गणेश जी को दूर्वा चढ़ाने की प्रथा शुरू हुई।
ठीक इसके उलट गणपति जी की पूजा में तुलसी चढ़ाना वर्जित है। इसके पीछे की कहानी के अनुसार, एक बार तुलसी गणेश जी को देख कर उनपे मोहित हो गईं और उनसे शादी करने का प्रस्ताव रख दिया जिसे गणेश जी ने अस्वीकार कर दिया। इस बात पर गुस्सा होकर तुलसी में गणेश जी को दो विवाह करने का श्राप दे दिया। तब गणेश जी ने भी तुलसी को श्राप दिया कि उनका विवाह एक असुर से होगा।इस पर तुलसी को अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने गणेश जी से माफी मांगी। गणेश जी ने तब कहा कि कलयुग में तुम मोक्ष दिलाने वाली बनोगी पर मेरी पूजा में तुम्हे नही चढ़ाया जायेगा।