सर गौर की जयंती पर जानिए रोचक किस्से : प्रिवी काउंसिल को भंग करने के लिए गौर ने उठाई थी मांग
सागर. गुलामी के समय सर डॉ. हरिसिंह गौर ने प्रिवी काउंसिल को भंग करने के लिए पांच बार प्रस्ताव रखा था। दरअसल, ब्रिटिश शासनकाल में देश की आखिरी कोर्ट इंग्लैंड में हुआ करती थी। भारत में कोर्ट के फैसले को चुनौती देने के लिए याचिकाकर्ताओं को ८ हजार किमी दूर इंग्लैंड जाना पड़ता था।
डॉ. गौर ने नागपुर रीजन के विधायक होने के नाते दिल्ली में इम्पीरियल सेंट्रल लेजिस्लेटिव असेंबली के दौरान यह प्रस्ताव रखा था। उन्हीं के प्रयासों से 1949 में प्रिवी काउंसिल जूरिस डिक्शन एबोलेशन एक्ट बना और यह कानून समाप्त हुआ। अब इसकी जगह देश की सर्वोच्च न्यायालय में अपील की जाती है।
26 पन्नों की सूची में मिलता है जिक्र
भारत रत्न कमेटी के डॉ.संदीप रावत द्वारा सुप्रीम कोर्ट को भेजी गई २६ पन्नों की सूची में सर गौर के छाया चित्र को कोर्ट में लगाने की मांग की है। इसमें यह भी बताया गया है कि सर गौर द्वारा पहला प्रस्ताव प्रिवी काउंसिल को भंग करने के लिए रखा था। साथ ही इसकी जानकारी भी दी है। यह जानकारी केंद्रीय विधानसभा के वॉल्यूम 5 पेज नंबर 1960 में इस बहस का उल्लेख मिलता है।
14 अगस्त 1833 को संसद ने पारित किया था प्रिवी कानून
26 मार्च 1921 को डॉ. गौर ने पहली बार की थी मांग
05 बार रखा था काउंसिल को भंग करने का प्रस्ताव
1925 में प्रस्ताव पर सर गौर ने की थी लंबी बहस
अंग्रेज प्रस्ताव वापस लेने नहीं थे तैयार
सर डॉ. हरिसिंह गौर ने असेंबली में पांच बार इस प्रस्ताव को रखा था। तीसरी बार 17 फरवरी 1925 को रखे गए प्रस्ताव में सर गौर ने लंबी बहस भी की थी। दरअसल अंग्रेजी हुकूमत इन प्रस्तावों को वापस लेने का दबाव बनाती थी। इस वजह से हर बार प्रस्ताव वापस हो जाते थे।
भगत सिंह की याचिका हुई थी खारिज
प्रिवी काउंसिल का विरोध डॉ.गौर ने इसलिए भी किया था, क्योंकि देशभक्त भगत सिंह को जब देश में स्थापित कोर्ट ने सजा सुनाई थी, तब उसके खिलाफ अपील प्रीवी कोर्ट में की गई थी। इंग्लैंड में राजा-महराजाओं द्वारा नियुक्त जजों ने यह याचिका खारिज कर दी थी।