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साधु का जीवन त्याग, तपस्या से शोभायमान होता है : आचार्य निर्भय सागर

यह बात वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर ने बालक काम्प्लैक्स तिली स्थित पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन में कही।

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Dec 06, 2024
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प्रत्येक प्राणी सुख चाहता है और सुख की सामग्री इक्कट्ठा करता है। सुख सुविधा की सामग्री मनुष्य ही जोड़़ पाता है। जहां अनुकूलता और निराकुलता है वहां सुख है, जहां प्रतिकूलता है, आकुलता है वहां दुख है। जीवन में पैसा सुख के लिए हो, पैसों के लिए जीवन न हो। यह बात वैज्ञानिक संत आचार्य निर्भय सागर ने बालक काम्प्लैक्स तिली स्थित पारसनाथ दिगंबर जैन मंदिर में प्रवचन में कही।
आचार्य ने कहा कि जो पैसों के लिए जीता है वह जीवनभर दुख उठाता है। यदि साधु के पास पैसा है, तो साधु का जीवन व्यर्थ है और घर में रहने वाले गृहस्थ के पास पैसा नहीं तो उसका जीवन व्यर्थ है। साधु का जीवन त्याग, तपस्या से शोभायमान होता है और गृहस्थ का जीवन धन, दौलत से शोभा को प्राप्त होता है। आचार्य ने कहा कि संसार के सभी संबंध दो अक्षरों से बने है जैसे काका, दादा, मामा, जीजा, पापा, फूफा, बूआ आदि। इसी प्रकार शरीर के प्रत्येक अंग उपांग दो अक्षर से बने है जैसे कान, नाक, होठ, पैर, पीठ, आंख इत्यादि इसलिए साधु दो की नहीं एक मात्र मैं की बात करते हैं। मैं को जानते पहचानते है। मां और मैं एक अक्षर वाला है इसलिए ये दोनों सुखकारी है। इसके पूर्व मुनि इन्द्रदत्त सागर महाराज ने अपने प्रवचन में कहा आदमी जितना अपने दुख से दु:खी नहीं है, जितना दूसरों के सुख से, दुखी है। कार्यक्रम का संचालन अध्यक्ष राजकुमार जैन एवं महामंत्री कमलेश ढाऩा ने किया। द्वीप प्रज्वलन महिला मण्डल ने किया।

Published on:
06 Dec 2024 05:01 pm
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