श्रीमद्भागवत कथा का हुआ समापन, अंतिम दिन सुदामा चरित्र, महाभारत, भगवान के विवाहों की कथा सुनाई, भजनों पर भक्तों ने किया जमकर नृत्य
बीना. खुरई रोड पर चल रही सात दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा का समापन शुक्रवार को हुआ। कथा वाचक जया किशोरी ने सुदामा चरित्र, भगवान के 16108 विवाह और महाभारत की कथा सुनाई।
उन्होंने कहा कि जिस प्रेम में कोई स्वार्थ न हो वह प्रेम है, स्वार्थ का प्रेम तब तक होता है, जब तक स्वार्थ नहीं निकल जाता है। स्वार्थ निकलने के बाद प्रेम खत्म हो जाता है। उन्होंने कहा कि सांसारिक रिश्तों में स्वार्थ होता है, क्योंकि इन रिश्तों में कुछ उम्मीदें होती हैं। भावनाओं का स्वार्थ रखेंगे, तो रिश्ता लंबा चलेगा, चीजों का स्वार्थ लंबे समय तक नहीं चलता है और चीजों के कारण एक दूसरे पर निर्भर हैं, प्रेम खत्म हो गया है। ऐसे रिश्ते का क्या फायदा। प्रेम से ऊपर कुछ नहीं है। कथा वाचक ने कहा कि भगवान ने 16108 विवाह किए हैं, लेकिन पूर्ण रूप से विवाह रुक्मिणी से हुआ है। जो विवाह हुए हैं, किसी न किसी कारण से भगवान के नाम लिए गए हैं। भौमासुर नामक राक्षस राजकुमारियों को कैद किए हुए था और भगवान ने उसका वध कर 16100 राजकुमारियों को मुक्त कराकर घर भेज दिया था, लेकिन घर वालों ने उन्हें नहीं अपनाया और जब राजकुमारियों ने भगवान से ही अपनाने के लिए कहा था, तो भगवान ने उन्हें अपना लिया था। उन्होंने सुदामा चरित्र का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि पत्नी के कहने पर सुदामा भगवान से मिलने जाते हैं और भगवान ने उनका स्वागत किया, पैर धुलवाए। सुदामा की पत्नी द्वारा भेजे गए चावल खाए और उनकी गरीबी दूर की।
भगवत कृपा का दिखावा नहीं करना चाहिए
कथा वाचक ने कहा कि मनुष्य का स्वभाव है, कोई कीमती चीज होगी, तो उसका दिखावा बहुत करता है। सांसारिक चीजों का दिखावा तो चलता है, लेकिन भगवत कृपा का दिखावा नहीं होता है। भगवत कृपा को संभाल कर और छिपाकर रखने की चीज है। उन्होंने कहा कि टीवी पर सीरियल देखकर कथा को सच न माने, इसके लिए शास्त्र पढ़ें।
भजनों पर भक्तों ने किया नृत्य
कथा के समापन पर कथा वाचक ने भजन गाए, जिसपर भक्तों ने जमकर नृत्य किया। पूरा पंडाल भगवान के जयकारों से गूंज उठा। कथा सुनने बड़ी संख्या में भक्त पहुंचे थे।