16 घंटे करते है काम, इनकी दिवाली है आपके हाथ

शहर की मिट्टी कला को आगे बढ़ाते परिवारों के लिए आज भी सिर्फ रस्म नहीं है दीपक बनाना। नचर्या सुबह 6 बजे से शुरू होती है और रात 10 बजे खत्म होती है। छोटे से लेकर बड़े तक सभी काम की धुन में रहते हैं।

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Oct 29, 2015
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सागर।कलाप्रेमियों का शहर कहलाने वाले सागर में अब घरेलू कलाकार ही उपेक्षा का शिकार हो रहे हैं। यहां बात मिट्टी से जुड़ी कुछ खास चीजों की हो रही है, जिन्हें विशेषकर दीपावली को ध्यान में रखकर तैयार किया जाता है। पिछले कुछ सालों तक शहर में मिट्टी के दीयों सहित बर्तनों, खिलौनों की खूब बिक्री हुआ करती थी।

इनकी दिवाली है आपके हाथ
धीरे-धीरे आधुनिक सामग्री ने बाजार पर अपना एकाधिकार जमा लिया। इन हालातों में भी कुछ परिवार ऐसे हैं, जो इसे सिर्फ रस्म नहीं, बल्कि आज भी अपनी पूंजी मानकर जीवन का अंधेरा दूर कर रहे हैं। तो इस दिवाली हम भी संकल्प लें कि मिट्टी के दीयों से अपने घर रोशन करने के साथ इनकी दिवाली भी रोशन करें।


हौसला अब भी बरकार
शहर में ऐसे कई शिल्पकार हैं, जो मिट्टी को नए-नए आकार देकर अपने परिवार का पेट पालते हैं। त्योहार नजदीक आते ही पूरा परिवार काम में लग जाता है और शुरू हो जाता है मिट्टी में जान फूंकने का सिलसिला। बाजार में फैंसी वस्तुओं की बिक्री बढऩे से भले ही इन परिवारों के उत्पादों की बिक्री प्रभावित हुई हो, लेकिन हौसला अब भी बरकार है।

आसान नहीं है मिट्टी को आकार देना
हर साल दीवाली के पहले मिट्टी को महीन करना, फिर कागज पीसकर गलाना और चक्के पर रखकर अलग-अलग आकार देना। यह कला दिखने में जितनी सामान्य लगती है, उतनी ही मुश्किल होती है। महंगाई के इस दौर में हर कोई सस्ते से सस्ता और अच्छे से अच्छा खरीदने की चाह रखता है। शुद्ध रूप से पीली मिट्टी से बनने वाले दीपक दिखने में ज्यादा आकर्षक नहीं होते, जितने दूसरी मिट्टी से बने दीपक। ऐसे में इस मिट्टी के कलाकारों को सस्ता और अच्छा बनाना काफी मुश्किल और खर्चीला होता जा रहा है।

इनके लिए मिट्टी ही सबकुछ
इतवारी टौरी स्थित कुम्हार गली में तीस सालों से मिट्टी के दीपक और दूसरे आयटम बना रहे कल्लू प्रजापति बताते हैं कि हमारे लिए मिट्टी ही सबकुछ है। बाजार में भले ही चायना आइटम्स की धूम हो लेकिन पुराने लोग आज भी मिट्टी के दिए ही खरीदते हैं। प्रजाति ने बताया कि दीपावली आने के दो महीने पहले से काम शुरू कर देते हैं। बीए पास करने के बाद भी आज मिट्टी ही इनकी रोजी-रोटी का साधन है।

सालभर करते हैं गुजर-बसर
राम प्रजापति बताते हैं कि हमारी दिनचर्या सुबह 6 बजे से शुरू होती है और रात 10 बजे खत्म होती है। छोटे से लेकर बड़े तक सभी काम की धुन में रहते हैं। पहले अच्छी खासी मात्रा में दिए बना लेते हैं, फिर बाजार में ठेले पर या दुकान लगाकर इन्हें बेचते हैं। त्योहारी सीजन में जितना काम लेते हैं, बस उसी से साल भर गुजर-बसर होती है।
Published on:
29 Oct 2015 12:07 pm
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