A high alert has been issued in the Veerangana Durgawati Tiger Reserve (VDTR) after tigress T-141 and her four cubs died due to canine distemper virus in Kanha Tiger Reserve.
VDTR on alert after 5 tigers die of canine distemper
कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस से बाघिन टी-141 समेत उसके चार शावकों की मौत के बाद वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व (वीडीटीआर) में हाई अलर्ट जारी कर दिया गया है। यहां अनुमानित 35 बाघों की निरंतर निगरानी और सख्त कर दी गई है। वन अधिकारियों ने बाघों के साथ-साथ तेंदुओं की सुरक्षा के लिए विशेष मॉनिटरिंग अभियान शुरू कर दिया है। इस वायरस से प्रभावित जानवर धीरे-धीरे कमजोर पड़ जाता है, उसकी याददाश्त भी चली जाती है। दो साल पहले देवास में तेंदुए को यह संक्रमण हुआ था जिससे उसकी याददाश्त चली गई थी।
जैसे नाम से ही स्पष्ट है कि कैनाइन डिस्टेंपर वायरस मुख्य रूप से कुत्तों (कैनाइन) और बिल्ली प्रजाति (फैलाइन) के जंगली प्राणियों में फैलने वाला संक्रमण है। इस वायरस से बाघ, शेर, तेंदुआ, चीता, जगुआर जैसी बिल्ली प्रजाति के साथ ही भेड़िया, सियार, लोमड़ी और रैकून जैसी कुत्ते प्रजाति के जानवर भी संक्रमित हो सकते हैं।
यह वायरस आमतौर पर संक्रमित कुत्तों से जंगली जानवरों तक पहुंचता है। गांवों से जंगल तक फैलने का खतरा होता है। वीडीटीआर के आसपास लगभग 40 गांव बसे हुए हैं। यदि इन गांवों में कोई कुत्ता संक्रमित हुआ तो वायरस तेजी से अन्य कुत्तों में फैल सकता है। जंगल में घुसने वाले कुत्तों के माध्यम से यह बाघों और तेंदुओं तक पहुंचने का खतरा बना रहता है।
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस सीधे शारीरिक संपर्क से फैलता है। एक साथ घूमने, एक स्थान पर रहने या संक्रमित जानवर का शिकार करने से यह दूसरे जानवर में पहुंच सकता है। बाघ अधिकतर अकेले रहते है लेकिन अगर किसी कुत्ते को यह संक्रमण है और बाघ उस कुत्ते का शिकार करता है तो ऐसे में यह वायरस फैलने का खतरा हो सकता है। बाघ अमूमन अकेले रहते हैं, लेकिन यदि कोई संक्रमित कुत्ता जंगल में मारा जाता है तो वायरस बाघ तक पहुंचने की आशंका बढ़ जाती है।
कुत्तों के साथ आसपास के गांव के गाय-भैंस का भी टीकाकरण किया गया था। शाकाहारी जानवरों में मुंहपका और खुरपका रोग होता है। यह जानवर जंगल में चरने जाते है ऐसे में उनसे यह रोग अन्य शाकाहारी जानवर जैसे हिरण और नीलगाय में फैल सकता है। बीमार जानवर का मांस खाने से बाघ को अटैक आने की संभावना रहती है। इसलिए पिछले साल ही आसपास के गांव के गाय-भैंस को एफएमडी व एसएसबीक्यू वैक्सीन लगाई गई थी।
यह वायरस सभी कैनाइन और फैलाइन प्रजातियों को प्रभावित कर सकता है। जंगल का क्षेत्रफल बहुत बड़ा होने के कारण हर जगह निगरानी रखना चुनौतीपूर्ण है, लेकिन हम बाघों की निरंतर मॉनिटरिंग कर रहे हैं। लक्षण दिखते ही तुरंत इलाज और वैक्सीनेशन की व्यवस्था की जाएगी।
रजनीश सिंह, वन अधिकारी