
Gulab Kothari Speech Stree Deh Se Aage: स्त्री को केवल देह, परिवार या किसी एक सामाजिक भूमिका तक सीमित करके नहीं देखा जा सकता। वह सृजन, संस्कार, संवेदना और चेतना की आधारशिला है। शिक्षा और करियर में आगे बढ़ते हुए स्त्री को अपनी मौलिक पहचान और संवेदनशीलता को बनाए रखना चाहिए। साथ ही परिवार और समाज में लड़के और लड़की दोनों को समान रूप से संस्कार, जिम्मेदारी और महिलाओं के सम्मान की शिक्षा मिलनी चाहिए। यह विचार पत्रिका समूह के प्रधान संपादक गुलाब कोठारी ने गुरुवार को दारूल उलूम, देवबंद में मुस्लिम फण्ड ट्रस्ट द्वारा संचालित गर्ल्स इंटर कॉलेज में आयोजित ‘स्त्री : देह से आगे’ कार्यक्रम में छात्राओं से संवाद के दौरान व्यक्त किए।
कोठारी ने कहा कि यह कार्यक्रम भाषण देने के लिए नहीं, बल्कि छात्राओं से संवाद करने और उनके सवालों को समझने के लिए है। समय के साथ लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज में बड़ा बदलाव आया है, लेकिन आज भी शिक्षा में स्त्री की विशिष्ट भूमिका, उसकी संवेदना और जीवन-दृष्टि पर पर्याप्त चर्चा नहीं होती। गणित, विज्ञान, भूगोल जैसे विषयों की तरह जीवन और समाज में स्त्री की भूमिका को भी समझना जरूरी है।
उन्होंने कहा कि स्त्री और पुरुष के शरीर और दायित्व अलग हो सकते हैं, लेकिन भीतर की चेतना एक है। भारतीय ज्ञान परंपरा में इसे प्रकृति और पुरुष, अग्नि और सोम तथा अर्धनारीश्वर जैसे प्रतीकों के माध्यम से समझाया गया है। उनके अनुसार जीवन का संतुलन तभी संभव है, जब स्त्री और पुरुष एक-दूसरे की पूरक शक्तियों को समझें और सम्मान दें।
‘स्त्री देह नहीं, चेतना है’ विषय को विस्तार देते हुए कोठारी ने कहा कि स्त्री में संवेदना, वात्सल्य, करुणा और संस्कार देने की विशेष क्षमता है। उन्होंने कहा कि आधुनिक शिक्षा में बुद्धि का विकास आवश्यक है, लेकिन संवेदना कमजोर नहीं होनी चाहिए। परिवार को जोड़ने के लिए केवल ज्ञान नहीं, बल्कि स्नेह और मानवीय संवेदना भी जरूरी है।
उन्होंने मातृत्व की भूमिका को विशेष रूप से रेखांकित करते हुए कहा कि मां केवल बच्चे को जन्म नहीं देती, बल्कि उसके व्यक्तित्व, संस्कार और व्यवहार के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। बच्चे के जीवन के शुरुआती वर्षों में माता-पिता द्वारा दिया गया वातावरण उसके आगे के जीवन को प्रभावित करता है। उन्होंने कहा कि लड़कों को भी बचपन से महिलाओं के सम्मान, समान अवसर और जिम्मेदारी की शिक्षा मिलनी चाहिए।
एक छात्रा ने पूछा कि शिक्षा और करियर के क्षेत्र में आगे बढ़ते हुए लड़कियां स्वयं को कैसे सशक्त बनाएं। इस पर कोठारी ने कहा कि लड़कियों को आगे बढ़ना चाहिए, लेकिन अपनी स्त्री पहचान और संवेदनशीलता को छोड़े बिना। उन्होंने कहा कि शिक्षा और करियर जीवन की ऊंचाइयों तक पहुंचने के साधन हैं, लेकिन इनके साथ मानवीय गुणों का विकास भी जरूरी है। उन्होंने छात्राओं से कहा कि वे अपने सपने देखें और उन्हें पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ें।
एक छात्रा ने पूछा कि क्या लड़कियों को भी लड़कों की तरह सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अधिकार है। कोठारी ने कहा कि सपने देखने का अधिकार सभी को है और आने वाली पीढ़ी में लड़के और लड़की के बीच अवसरों का भेद नहीं होना चाहिए। उन्होंने अभिभावकों से बच्चों को समान अवसर देने और विशेष रूप से लड़कों को महिलाओं के सम्मान की शिक्षा देने का आह्वान किया।
एक छात्रा ने पूछा कि महिलाओं के फील्ड में काम करने के बावजूद उन्हें गलत नजर से क्यों देखा जाता है। इस पर उन्होंने कहा कि लड़का हो या लड़की, दोनों को ऐसा संस्कार मिलना चाहिए कि वे समाज की गरिमा और महिलाओं के सम्मान को समझें। उन्होंने कहा कि आने वाली पीढ़ी को उन शिकायतों से मुक्त करना जरूरी है, जिनका सामना पिछली पीढ़ियां करती रही हैं।
महिला के साथ होने वाले भेदभाव और सामाजिक दृष्टिकोण पर पूछे गए सवाल के जवाब में कोठारी ने कहा कि पिछली पीढ़ियों में जो गलतियां हुईं, उन्हें बदला नहीं जा सकता, लेकिन आने वाली पीढ़ियों के लिए बेहतर वातावरण तैयार किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि समाज कोई अलग इकाई नहीं है, परिवार और व्यक्ति मिलकर समाज बनाते हैं। यदि हर परिवार अपने बच्चों को समानता और सम्मान की शिक्षा देगा तो उसका असर पूरे समाज पर पड़ेगा।
कार्यक्रम में एक सवाल यह भी उठा कि बच्चों के पालन-पोषण और संस्कार की जिम्मेदारी यदि मां की है तो पिता की भूमिका क्या है। कोठारी ने कहा कि बच्चे का निर्माण मां और पिता दोनों की जिम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि मां को बच्चे के शुरुआती संस्कारों में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी होती है, लेकिन पिता भी समान रूप से जिम्मेदार है। दोनों मिलकर बच्चे को अच्छा इंसान बनाने का प्रयास करें, तभी परिवार और समाज मजबूत होगा।
उन्होंने कहा कि महिलाओं को कमजोर समझना गलत है। स्त्री के भीतर परिवार और संबंधों को जोड़ने की शक्ति है। यह शक्ति तभी सकारात्मक परिणाम दे सकती है, जब उसे स्वयं अपनी भूमिका और क्षमताओं का बोध हो।
कार्यक्रम की शुरुआत सबा हसीब सिद्दीकी और इंटर कॉलेज परिवार की ओर से गुलाब कोठारी के स्वागत से हुई। स्वागत गीत, पुष्पगुच्छ, शॉल, पगड़ी और स्मृति-चिह्न भेंट कर उनका अभिनंदन किया गया। उन्होंने देवबंद की इल्मी और तहजीबी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि देवबंद में दशकों से बेटियों की शिक्षा और प्रगति के लिए कार्य किए जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि हिंदी और उर्दू केवल भाषाएं नहीं, बल्कि साझा तहजीब और आपसी मेलजोल की पहचान हैं। उन्होंने कोठारी की उपस्थिति को छात्राओं के लिए प्रेरणादायी अवसर बताया और उनके लेखन तथा विचारों का उल्लेख किया।
कार्यक्रम के दौरान कोठारी की पुस्तक ‘मानस’ के उर्दू अनुवाद की प्रति सबा हसीब सिद्दीकी को भेंट की गई। छात्राओं ने शिक्षा, करियर, महिला सशक्तीकरण, सपनों, परिवार, सामाजिक दृष्टिकोण और पुरुषों की भूमिका से जुड़े सवाल पूछे। कार्यक्रम के अंत में सिद्दीकी ने कोठारी और अतिथियों का आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि छात्राओं को मिले विचार उनके जीवन में नई ऊर्जा, दिशा और संकल्प पैदा करेंगे।
सवाल : सशक्त महिला किसे माना जाए, जिसके पास अधिकार हों, ज्ञान हो, आत्मनिर्भरता हो या अपने फैसले लेने की स्वतंत्रता?
जवाब : शिक्षा और आत्मनिर्भरता के साथ अपनी जिम्मेदारियों और भूमिका को समझना भी जरूरी है। शुरुआती उम्र से बच्चों के संस्कार और मार्गदर्शन में मां की भूमिका अहम है।
सवाल : क्या लड़कियों को भी लड़कों की तरह बड़े सपने देखने और उन्हें पूरा करने का अधिकार है?
जवाब : लड़कियों को सपने देखने और उन्हें पूरा करने का पूरा अवसर मिलना चाहिए। परिवार को लड़के और लड़की के बीच अवसरों का भेद नहीं करना चाहिए।
सवाल : क्या स्त्री केवल परिवार तक सीमित है या देश-समाज के निर्माण में भी उसकी भूमिका है?
जवाब : व्यक्ति केवल अपने लिए नहीं जीता। परिवार से आगे समाज और पूरी मानवता के प्रति उसकी जिम्मेदारी है। व्यक्ति का अच्छा या खराब कर्म व्यापक समाज को प्रभावित करता है।
सवाल : महिलाओं के फील्ड में काम करने पर भी उन्हें गलत नजर से क्यों देखा जाता है?
जवाब : लड़के और लड़कियों दोनों को बचपन से समानता और महिलाओं के सम्मान की शिक्षा देनी होगी। आने वाली पीढ़ी को बेहतर संस्कार देना ही इसका स्थाई रास्ता है।
सवाल : बच्चों के निर्माण में पिता की क्या जिम्मेदारी है?
जवाब : बच्चे की जिम्मेदारी मां और पिता दोनों की है। दोनों मिलकर बच्चे को अच्छा इंसान बनाने का प्रयास करें, तभी परिवार और समाज मजबूत होगा।