सतना

वोटर बनकर रह गए बुजुर्ग, न घोषणा न योजना

विश्व वृद्धजन दिवस पर विशेष
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Updated: 1 Oct 2018, 3:52 PM IST
वोटर बनकर रह गए बुजुर्ग, न घोषणा न योजना
वोटर बनकर रह गए बुजुर्ग, न घोषणा न योजना

सतना. इतिहास गवाह है... प्राचीन काल में वृद्धजनों की स्थिति समाज में सम्माननीय रही है। परिवार एवं समाज में उनका वर्चस्व होता था। घर की बागडोर बुजुर्ग के हाथों में होती थी। परिवार में हर निर्णय उनके मशविरे और उनकी अनुमति से ही होते थे। तब वृद्धजन समाज एवं परिवार के सत्ता संचालक और पथ प्रदर्शक होते थे। आधुनिकता की इस अंधी दौड़ में संयुक्त परिवार की परम्परा टूटती गई। एकल परिवार की नई व्यवस्था ने बुजुर्गों से न सिर्फ उनका सम्मान बल्कि उनकी सत्ता छीन ली है। उन्हें घर, परिवार एवं समाज से भी बेदखल कर दिया है। चिंता का विषय यह है कि कभी परिवार की रीढ़ व समाज के पथ-प्रदर्शक रहे बुजुर्गों की स्थिति आज देश में अनुपयोगी वस्तु की तरह होती जा रही है। हमारी युवा पीढ़ी बुजुर्गों की सलाह लेना तो दूर उन्हें अपने पास रखने से भी कतरा रही है। बुजुर्गों के लिए अब वृद्धाश्रम खोलने पड़ रहे हैं। परिवार से उपेक्षित वृद्धजन सरकार के लिए भी सिर्फ वोटर बनकर रह गए हैं। सरकारों का पूरा ध्यान युवा मतदाताओं को साधने तक सीमित है। बुजुर्ग भी देश के नागरिक हैं, वे भी जनप्रतिनिधि चुनने और सरकार बनाने में युवाओंं के साथ कंधे से कंधा मिलाकर मतदान करते हैं पर सरकार न उनके लिए कोई योजना ला रही और न ही उनके हितार्थ कोई घोषणा हो रही।
पार्टियों के एजेंडे से गायब बुजुर्ग: परिवार एवं समाज में उपेक्षा का दंश झेल रहे बुजुर्ग राजनीतिक पार्टियों के लिए भी सिर्फ मतदाता बनकर रह गए हैं। पार्टियों का पूरा ध्यान युवा मतदाताओं को लुभाकर सत्ता हासिल करना रह गया है। चुनाव आते ही युवाओं के लिए मोबाइल फोन, लैपटॉप, फ्री वाइ-फाइ तथा रोजगार देने जैसे वादे पार्टियों के एजेंडे में शामिल हो जाते हैं पर वृद्धजनों के लिए पार्टी एवं सरकारों के पास कोई योजना नहीं।
अपनों ने किया किनारा, वृद्धाश्रम बना सहारा
एकल परिवार में बुजुर्गों की स्वीकार्यता कम होती जा रही है। माता-पिता अपना पूरा जीवन इस उम्मीद के साथ बच्चों की शिक्षा एवं उनके लिए सुख-सुविधाएं जुटाने में लगा देते हैं कि जीवन के अंतिम पड़ाव में बच्चे उनका सहारा बनेंगे। पर हकीकत इससे विपरीत है। नीमी रोड़ स्थित शहर का इकलौता वृद्धाश्रम चंद्राश्रय अपनों द्वारा ठुकराए गए बेसहारा बुजुर्गों के लिए सहारा बन रहा है। इस वृद्धाश्रम में ४० से अधिक बुजुर्ग शरण लिए हुए हैं। अपनों से दूर एकांत में बुढ़ापा काट रहे इन बुजुर्गों ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा, हमारे पास पैसा है पर कोई सहारा नहीं। इसलिए आश्रम में शरण लेने को मजबूर हैं। चंद्राश्रय में दिन काट रहे बुजुर्गों से जब पूछा गया कि सरकार से आपकी क्या अपेक्षाएं हैं? तो उन्होंने कहा कि जब अपनों ने साथ नहीं दिया तो इस उम्र में सरकार क्या साथ देगी? एक बुजुर्ग ने कहा कि वृद्ध हैं लेकिन हम भी देश के नागरिक हैं। इसलिए सरकार को हमारे बारे में भी सोचना चाहिए। सरकार हर जिले में एक वृद्धाश्रम खोले ताकि बेसहरा बुजुर्गों के लिए सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएं। एक बुजुर्ग ने कहा कि इस बुढ़ापे में सरकार और क्या देगी? बस, रोटी-कपड़ा और मकान का इंतजाम करे।
सत्ता बदलने की कूबत
प्रदेश की कुल आबादी की लगभग २० प्रतिशत जनसंख्या बुजुर्गों की है। प्रदेश में ४.५० लाख पेंशनर तथा लगभग १५ प्रतिशत बुजुर्ग मतदाता हंै। जिले में लगभग दो लाख बुजुर्ग मतदाता हैं। जो कुल मतदाताओं का १३ फीसदी है। यह वह संख्या है जो अपने दम प विधायक व सरकार तो नहीं चुन सकती पर यदि अपने अधिकारों को लेकर संगठित हो जाए तो चुनाव में उलट फेर रखने की कूबत रखती है। हालांकि जाति एवं धर्म में बंटे बुजुर्ग अपने अधिकारों के लिए संगठित होकर आवाज बुलंद नहीं कर पा रहे। इसलिए पार्टियां बुजुर्ग मतदाताओं को भाव नहीं दे रही।
वृद्धजनों के लिए यह हो
बुजुर्गों को मिले सम्मान, हर जिले में खुले वृद्धाश्रम, दफ्तरों में हो अलग काउंटर, गरीब वृद्धजनों मिले सम्मानजनक पेेंशन, अस्पताल में आरिक्षत हो वार्ड, मिले गुणवत्तायुक्त दवा, वेतनवृद्धि के साथ बढ़े पेशनरों की पेंशन, रोटी, कपड़ा-मकान सुनिश्चित करे सरकार।
कैसे लौटे बुजुर्गों का सम्मान
कायम हो संयुक्त परिवार व्यवस्था, बदले देश की शिक्षा व्यवस्था, नैतिक एवं सामाजिक शिक्षा पर हो जोर, वृद्धजनों के लिए बने विशेष योजना, बुजुर्गों की सुरक्षा के लिए बने कठोर कानून, बुजुर्गों का मान बढ़ाने हो प्रचार प्रसार।
बोझ नहीं आशीर्वाद हैं बुजुर्ग
वृद्धजन छांव देने वाले वट वृक्ष के समान होते हैं। वे मकान को घर बनाते हैं। वृद्ध माता-पिता पुत्र के लिए बोझ नहीं आशीर्वाद हैं। हालांकि देश में तेजी से बढ़ रही पाश्चात्य संस्कृति ने हमारे पारिवारिक एवं सामाजिक ताना-बाना को खत्म कर दिया है। शिक्षा के नाम पर बच्चों को साक्षर किया जा रहा है। देश व्यावसायिक शिक्षा की अंधी दौड़ में शामिल है। नौतिक शिक्षा किताबों से गायब होती जा रही। यदि हम बुजुर्गों का सम्मान करना चाहते हैं तो हमें अपने बच्चों को बताना होगा कि वृद्ध माता-पिता बोझ नहीं घर में ईश्वर का दूसरा रूप हैं। हमें संयुक्त परिवार में रहने की आदत डालनी होगी।
राधेलाल शर्मा, रिटायर्ड शिक्षक
बस इतना करे सरकार
घर एवं समाज में बुजुर्गों की वही स्थिति है जो वर्तमान में देश के अंदर सवर्णों की है। बुजुर्ग को सम्मान तो दूर घर में जगह और खाने के लिए दो रोटी नहीं मिल रही। आज तक सरकारों ने न वृद्धजनों को कुछ दिया है और न आगे कुछ देने वाली हंै। डूबते सूरज को कोई सलाम नहीं करता। सरकार ने बुजुर्गों के लिए जो योजनाएं चला रखी हंै वे सिर्फ दिखावा हैं। कहने के लिए ट्रेन किराए में बुजुर्गों को ५० प्रतिशत की छूट है पर हकीकत यह है कि टिकट में भी जीएसटी देना पड़ता है। बैंकों में बुजुर्गों के लिए अलग खिड़की खोलने के आदेश हुए थे। इसका पालन आज तक नहीं हो सका। सरकार और कुछ नहीं दे सकती। हमारी सरकार से मांग है कि वह बुजुर्गों को गुणवत्तायुक्त दवाई और सुरक्षा दे दे, यही सरकार की बड़ी कृपा होगी।
हरि प्रकाश गोस्वामी, अध्यक्ष भारत पेंशनर्स समाज
हमारी सरकार ने वृद्धजनों के लिए बहुत कुछ किया है और आगे भी करेगी। मुख्यमंत्री ने गरीब बुजुर्गों को मुफ्त में चार-धाम की यात्रा कराने तीर्थदर्शन योजना चालू की। उनके लिए पेंशन योजना लागू की गई। सरकार वृद्धजनों के हितार्थ कई योजनाएं चला रही है। जहां तक बात बुजुर्गों के सम्मान की है तो इसके लिए सरकार नहीं परिवार एवं समाज जिम्मेदार है। वृद्धजन अनुभव का खजाना हैं। उन्हें हमेशा अपने साथ रखना चाहिए। बच्चों को नैतिक शिक्षा देने की जिम्मेदारी सरकार की नहीं परिवार की है। सभी माता-पिता अपने बच्चों को संस्कारित शिक्षा दंे। लोग संयुक्त परिवार में रहना सीखें तभी बुजुर्गों का सम्मान बढ़ेगा।
नरेन्द्र त्रिपाठी, जिलाध्यक्ष भाजपा
भाजपा सरकार में बुजुर्गों का उत्पीडऩ बढ़ा है। सरकार बुजुर्गों के लिए जो भी योजनाएं चला रही है वे दिखवा हैं। तीर्थदर्शन योजना भाजपा नेता और अधिकारी-कर्मचारियों को मुफ्त में तीर्थयात्रा कराने के लिए चालू की गई है। वृद्धापेंशन देने के नाम पर प्रदेश सरकार बुजुर्गों से मजाक कर रही है। १५० रुपए पेंशन पाने के लिए गरीब महीनों बैंक के चक्कर लगाते हैं। भाजपा सरकार गांधी-नेहरू को कितनों से हटाकर बच्चों को गोडसे की जीवनी पढ़ाती है। हमारी सरकार ने स्कूलों में नैतिक शिक्षा को बढ़ावा देने कई कदम उठाए थे पर इस सरकार ने शिक्षा का व्यवसायीकरण कर दिया।
राजेंद्र मिश्रा,जिलाध्यक्ष, कांग्रेस, ग्रामीण

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