
Sawai Madhopur Panther Attack News: रक्षाबंधन का पावन त्योहार सिर पर है। देश भर में बहनें अपने भाइयों के लिए रेशमी धागे चुन रही हैं और उनकी लंबी उम्र की दुआएं मांग रही हैं। लेकिन सवाई माधोपुर जिले के छाण क्षेत्र स्थित दूमोदा गांव के एक छोटे से घर में रक्षाबंधन की तैयारियों की जगह सन्नाटा और सिसकियां पसरी हुई हैं, जिस घर के आंगन में हंसी-खुशी की गुंजाइश हुआ करती थी, वहां अब केवल अपनों का दर्द और आंसुओं का सैलाब है।
इस दर्द की वजह है तीन वर्षीय मासूम दिलखुश की असमय दर्दनाक मौत। दिलखुश अपने माता-पिता का इकलौता बेटा और अपनी चार बहनों का सबसे दुलारा भाई था। कुछ ही दिन पहले तक वह अपने घर के आंगन में बेफिक्र होकर खेल रहा था। उसकी हंसी और तोतली बातें पूरे घर में चहकती थीं। लेकिन किसे पता था कि जंगल का एक आदमखोर पैंथर (तेंदुआ) चुपके से उसकी मासूमियत पर झपट्टा मारने की ताक में बैठा है।
आंगन में खेलते हुए दिलखुश को पैंथर अचानक उठाकर ले गया। परिजनों और ग्रामीणों के होश उड़ गए, लेकिन जब तक दिलखुश की खोज हुई, जंगल में उसकी मौत हो चुकी थी। इस खौफनाक हादसे ने एक हंसते-खेलते परिवार का चिराग पल भर में बुझा दिया।
इस बार रक्षाबंधन पर चारों बहनों के पास रंग-बिरंगी राखियां तो होंगी, लेकिन उन धागों को बांधने के लिए वह कलाई ही नहीं होगी, जिसकी सलामती की मन्नत वे हमेशा मांगती थीं। चारों बहनों की आंखें रो-रोकर सूज गई हैं। उन्हें अब भी यकीन नहीं हो पा रहा है कि जिस भाई के साथ वे कल तक खेल रही थीं, वह अब कभी लौटकर नहीं आएगा। दिलखुश की मासूम यादें बार-बार बहनों और माता-पिता के सामने आ रही हैं, जिससे उनके घाव हरे हो रहे हैं।
दूमोदा गांव के लोग परिवार के इस दुख में शामिल हैं। लोग पीड़ित परिवार के घर पहुंचकर ढांढस बंधाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन इकलौते बेटे को खोने का गम किसी दिलासे से कम नहीं हो रहा। दुख के साथ-साथ ग्रामीणों के दिलों में गहरा डर भी घर कर गया है। गांव वालों के मुताबिक, क्षेत्र में लंबे समय से पैंथर की आवाजाही बनी हुई है। रिहायशी इलाकों के आसपास पैंथर की लगातार गतिविधियों से बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
स्थानीय लोगों ने वन विभाग से मांग की है कि क्षेत्र में प्रभावी गश्त बढ़ाई जाए और पैंथर की गतिविधियों पर सख्त निगरानी रखकर उसे तुरंत पकड़ा जाए। ग्रामीणों का कहना है कि प्रशासन ठोस और त्वरित कदम उठाए ताकि दूमोदा गांव की तरह किसी और घर का चिराग इस तरह न बुझे और किसी और बहन की कलाई हमेशा के लिए सूनी न रह जाए।