विज्ञान और टेक्नोलॉजी

आर्टिफीसियल इंटेलिजेंस ने बताया की 38 साल थी हमारे पूर्वजों की औसत आयु

-उस समय वर्तमान हाथियों के पूर्वज विशालकाय मैमथ करीब 60 साल की उम्र तक जिंदा रहते थे। जबकि ग्रीनलैंड शार्क करीब 400 और बोहैड व्हेल करीब 268 साल तक जीवित रहती हैं।
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Updated: 10 Feb 2020, 6:18 PM IST
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस ने बताया की 38 साल थी हमारे पूर्वजों की औसत आयु
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस ने बताया की 38 साल थी हमारे पूर्वजों की औसत आयु

हाल ही एक जीवविज्ञानी बेंजामिन मेने ने अपनी डीएनए-आधारित कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence) तकनीक का उपयोग कर बताया कि हमारे पूर्वजों का औसत प्राकृतिक मानव जीवन काल (Natural Life Span) केवल 38 साल का हुआ करता था। ऑस्टे्रलिया के आणविक जीवविज्ञानी और जैव सूचना विज्ञान (CSIRO) में काम करने वाले मेने की यह नई तकनीक दरअसल विभिन्न जीव-जंतुओं और उनकी प्रजातियों के डीएनए का विश्लेषण कर उनके जीवनकाल का अनुमान लगाने के लिए विकसित की गई है। इस तकनीक केे आधार पर मेने ने बताया कि वर्तमान हाथियों के पूर्वज विशालकाय मैमथ करीब 60 साल की उम्र तक जिंदा रहते थे। जबकि ग्रीनलैंड शार्क (Greenland Shark) करीब 400 और बोहैड व्हेल (Bow Head Whale) करीब 268 साल तक जीवित रहती हैं।

नेचर साइंटिफिक रिपोट्र्स (Nature Scientific Reports) में प्रकाशित शोध के अनुसार जीव-जंतुओं की अलग-अलग प्रजातियों में मौजूद डीएनए (DNA) उनके जीवनकाल की सीमा को भी प्रभावित करता है। अब तक यह निर्धारित करना मुश्किल था कि कोई जानवर कितने साल तक जीवित रह सकता है। मेने बताते हैं कि डीएनए सभी जीवित जीवों का ब्लूप्रिंट (Blueprint) है और यह उम्र बढऩे और जीवनकाल का सटीक अनुमान लगाने की महत्त्वपूर्ण कुंजी है। हालांकि अभी तक कोई भी डीएनए अनुक्रमों में अंतर नहीं ढूंढ सका है जो असल में विभिन्न जीव-जंतुओं के जीवन काल में अंतर का प्रमुख कारण है।

डीएनए घडिय़ां बताएंगी उम्र
बीते कुछ सालों में वैज्ञानिकों ने ऐसी डीएनए आधारित घडिय़ां विकसित की हैं जो 'डीएनए मिथाइलेशन' नामक डीएनए में होने वाले परिवर्तन के आधार पर यह बता सकती हैं कि कोई जीव कितने साल पहले मौजूद था और इसकी उस समय क्या उम्र रही होगी। डीएनए मिथाइलेशन जीन में मौजूद अनुक्रम को नहीं बदलता है लेकिन यह इसे नियंत्रित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने यह भी दिखाया कि विशिष्ट जीन में डीएनए मिथाइलेशन प्राइमेट्स जैसे मनुष्य, बंदर और अन्य स्तनधारियों में अधिकतम जीवनकाल के लिए भी उत्तरदायी है। मेने ने अपने शोध में इन जीवों के 252 जीनोम यानि संपूर्ण डीएनए का उपयोग किया था। इसके बाद मेने और उनकी टीम ने इन जीनोमों की तुलना ज्ञात पशु जीवन काल के एक अन्य डेटाबेस से की। शोधकर्ताओं ने पाया कि वे इस तकनीक का उपयोग कर 42 विशेष जीनों में डीएनए मिथाइलेशन होने पर रीढ़ वाली प्रजातियों के जीवनकाल का अनुमान लगा सकते हैं। यह विधि लंबे समय तक जिंदा रहने वाली और विलुप्त हो चुकी प्रजातियों के जीवनकाल का भी सटीक अनुमान बताती है।

कम जीते थे हमारे पूर्वज
दिलचस्प बात यह है कि टीम ने आधुनिक मानवों की विलुप्त हो चुकी निएंडरथल और डेनिसोवन्स मानवों की उम्र का भी पता लगाया जो अधिकतम आयु 37.8 वर्ष ही थी। डीएनए के आधार पर मेने ने आधुनिक मनुष्यों के प्राकृतिक जीवनकाल का भी अनुमान लगाया जो प्रारंभ में विकसित हुए आधुनिक आदिमानवों के मानवशास्त्रीय अनुमानों से मेल खाता है। हालांकि, आज हमारी औसत आयु इस अध्ययन का अपवाद है क्योंकि चिकित्सा और जीवनशैली में प्रगति ने आज के मानवों के औसत जीवनकाल को बढ़ा दिया है।

ऐसे तैयार की एआइ
बेंजामिन मेने और उनके सहयोगियों ने विभिन्न जानवरों के जीवनकाल का अंदाजा लगाने के लिए एक कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तकनीक का निर्माण किया। ऐसा करने के लिए, उन्होंने स्तनधारी, सरीसृप, मछली जैसे जीव-जंतुओं के पांच वर्गों की 252 प्रजातियों के ज्ञात जीनोम (Genome) पर एआइ को प्रशिक्षित किया। इसके बाद एआइ ने 30 हजार जीनोम में से 42 ऐसे डीएनए को अलग कर दिया जो लंबे जीवन काल से जुड़ा हुआ था। इनका उपयोग टीम ने एक सूत्र बनाने के लिए किया गया था जो उन्हें अधिकतम जीवनकाल के बारे में सटीक अंदाजा लगाने में सक्षम बनाता है। टीम ने कुछ विलुप्त हो चुकी प्रजातियों का औसत जीवनकाल जानने के लिए एआई का परीक्षण किया। एआइ ने अनुमान लगाया कि मैमथ 60 साल तक जीवित रह सकते थे जबकि आधुनिक मनुष्यों के विलुप्त निकट संबंधी डेनिसोवन्स लगभग 38 वर्षों तक जीवित रह सकते थे।

जब अधिकतम जीवनकाल वाले जीवों से मनुष्यों की तुलना की गई तो चार साल का अंतर आया। मेने ने कहा कि यह तकनीक अभी शुरुआती अनुमान लगा रही है। स्पष्ट परिणामों के लिए हमें और अधिक डेटा की जरुरत होगी। क्योंकि यह तकनीक उम्र का अंदाजा लगाने के लिए कैद में (In Captivity) रखे गए और जंगलों में रहने वाले दोनों तरह के जीवों के जीनोम का उपयेाग करता है। यूके के एक्सेटर विश्वविद्यालय के professor इलिस हैनॉन का कहना है कि यह तकनीक इतिहास की विलुप्त हो चुकी जानकारी को उजागर करने में सक्षम है।

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10 Feb 2020, 6:18 PM IST
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