विज्ञान और टेक्नोलॉजी

ISRO ने हैदराबाद से एरोसोल परतों के अध्ययन के लिए विभिन्न वैज्ञानिक उपकरणों वाले गुब्बारे छोड़े

उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों में एरोसोल की परत नजर आने के बाद पिछले महीने इसरो और नासा ने यह अध्ययन प्लास्टिक के 15 छोटे-बड़े गुब्बारे भेजकर किया।
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Updated: 12 Sep 2017, 8:16 PM IST
ISRO Balloons
Balloons

बेंगलूरु। कचरा जलाने, वाहनों व ऊर्जा संयंत्रों का उत्सर्जन, ज्वालामुखी विस्फोट और बॉयोमास आदि के जलने से निकलने वाले एरोसोल (सब-माइक्रोन आकार के निलंबित कण) दक्षिण एशिया के आसमान में एक चादर की तरह बिछ गए हैं। ज्वालामुखी विस्फोट के दौरान धरती से कुछ किलोमीटर की ऊंचाई तक इनकी मौजूदगी आम बात है लेकिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और NASA के हाल में किए गए संयुक्त अध्ययन से यह पता चला है कि ये एरोसोल धरती से 16-17 किलोमीटर की ऊंचाई पर क्षोभमंडल से समताप मंडल तक फैल गए हैं। उपग्रहों से प्राप्त तस्वीरों में एरोसोल की परत नजर आने के बाद पिछले महीने इसरो और नासा ने यह अध्ययन प्लास्टिक के 15 छोटे-बड़े गुब्बारे भेजकर किया। अध्ययन के दौरान पहली बार इन एरोसोल में नाइट्रेट की मौजूदगी का भी पता चला।

प्रदूषित गैसों से बने एरोसोल
इसरो ने कहा है कि दक्षिण एशिया के उष्ण कटिबंधीय क्षेत्र में क्षोभमंडल की ऊंचाई पर एरोसोल की एक गहरी परत जमी है। यह प्रदूषण कारक गैसों के परिणामस्वरूप बना है और ग्रीष्मकालीन मौसम में तीव्र संवहन के कारण क्षोभमंडल की ऊपरी सीमा से समताप मंडल की निचली सीमा तक पहुंच गया है। ये प्रदूषक तत्व वायुमंडल में प्रवेश करने के बाद देर तक जमे रहते हैं और अपने विषम रासायनिक गुणों से एक पतले बादल की परत का रूप ले लेते हैं। यह धरती की ऊर्जा, समताप मंडल में ओजोन और जलवायु पर व्यापक प्रभाव डालतेे हैं। यह चिंता का विषय है क्योंकि प्रदूषणकारी गैसों से निर्मित एरोसोल निचली समताप मंडल के ओजोन परतों को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

एरोसोल में नाइट्रेट की मौजूदगी

गुब्बारे के जरिए किए गए विस्तृत अध्ययन से एशियाई क्षेत्र में उपग्रहों से मापे गए एरोसोल की परतों की मौजूदगी की पुष्टि हुई। साथ ही 16.5 से 18.5 किमी की ऊंचाई पर एरोसोल की परतों में तीव्र बढ़ोतरी का पता चला। इन परतों में मौजूद कणों के आकार 0.25 माइक्रोन से छोटे हैं और 90 फीसदी अस्थिर हैं। अभियान के दौरान एकत्रित नमूनों के प्रारंभिक रासायनिक विश्लेषण से इसमें प्रमुख रूप से नाइट्रेट की मौजूदगी का पता चला। इसरो ने कहा है कि यह एक नई खोज है। अध्ययनों से पता चला कि भारत के उत्तरी भाग विशेष रूप से बंगाल की खाड़ी के ऊपर जब गर्म और सर्द हवाएं आपस में टकराती हैं तो उस स्थिति में हवा का अभिसरण ऊपर की ओर होता है और तब बड़ी मात्रा में हवा में मौजूद धूलकण आदि सीधे वायुमंडल में प्रवेश करते हैं। एशियाई मॉनसून के दौरान जुलाई-अगस्त में ऐसी स्थितियां बनती हैं। ये
अध्ययन वर्ष 2020 तक जारी रहेंगे।

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