सिवनी

स्कूलों में कमीशनखोरी का ‘सिलेबस’, बढ़े खर्च से पालक बेहाल

बच्चों की पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है। निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के अभिभावकों को ज्यादा आर्थिक दबाव झेलना पड़ रहा है।
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Apr 05, 2026
There is going to be a big change in the time-table of schools in Uttarakhand
उत्तराखंड में स्कूलों के टाइम टेबल में बड़ा बदलाव होने वाला है

सिवनी. नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत के साथ बच्चों के एडमिशन, किताबें, कॉपियां, ड्रेस और अन्य जरूरी सामानों के बढ़ते दाम ने अभिभावकों की चिंता बढ़ा दी है। बच्चों की पढ़ाई का खर्च लगातार बढ़ रहा है। इसका सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है। निजी स्कूलों में पढऩे वाले बच्चों के अभिभावकों को ज्यादा आर्थिक दबाव झेलना पड़ रहा है। शहर के बारापत्थर निवासी रमेश शुक्ला ने बताया कि स्कूलों की ओर से हर साल किताबें बदल दिए जाने से पुरानी किताबें किसी काम की नहीं रह जातीं। इसके कारण हर वर्ष पूरा सेट नया खरीदना पड़ता है। इस बार भी वैसी ही स्थिति है। आधुनिक कॉलोनी निवासी पूनम शर्मा ने बताया किस्कूलों की किताबें केवल तय दुकानों पर ही उपलब्ध हैं, जहां कीमतें सामान्य से अधिक हैं। अभिभावक अंजली प्रजापति ने बताया कि एक बच्चे के एडमिशन से लेकर यूनिफॉर्म, जूते, बैग, कॉपी, किताबें और अन्य जरूरी सामग्री पर करीब 8 से 10 हजार रुपये तक खर्च हो रहे हैं। यह खर्च क्लास सेकंड में पढऩे वाले बच्चे पर भी आ रहा है। स्कूल फीस अलग है, जबकि किताबें और ड्रेस पर अलग से बड़ी रकम खर्च करनी पड़ रही है। बच्चों की पढ़ाई जरूरी है, लेकिन हर साल बढ़ते खर्च ने परिवार की आर्थिक स्थिति बिगाड़ दी है।

विरोध करने पर बच्चों से भेदभाव का डर
अभिभावकों का कहना है कि स्कूल हर साल किताब बदल दे रहे हैं। चुनिंदा दुकानों में ही स्कूलों की किताब, ड्रेस मिल रही है। ऐसे में मजबूरी में इन्हीं दुकानों से ही किताबें, कॉपियां, यूनिफॉर्म और अन्य शैक्षणिक सामग्री मनमानी दाम पर खरीदनी पड़ रही है। पालकों की जेब पर अतिरिक्तआर्थिक बोझ पड़ रहा है। अभिभावकों का आरोप है कि स्कूल और दुकानदारों के बीच कमीशन का सीधा गठजोड़ है। हर साल नए सत्र में सूची बदल दी जाती है और पुराने सामान को अनुपयोगी कर दिया जाता है। विरोध करने पर बच्चों के साथ भेदभाव का डर भी बना रहता है, इसलिए अधिकांश पालक चुप रहने को मजबूर हैं। बड़ी बात यह है कि प्रशासन भी इस पर कोई कार्रवाई नहीं कर रहा है।

एक साल ही चल पाई एनसीईआरटी बुक
पिछले वर्ष कई निजी स्कूलों ने कक्षा 1 से 8वीं तक एनसीईआरटी बुक लागू कर दिया था। इससे काफी राहत मिल गई थी, लेकिन इस बार एक दो किताबें छोडकऱ सभी निजी प्रकाशकों की किताबें लागू कर दी गई हैं, जो काफी महंगी हैं।

पुरानी किताबें, ड्रेस हो जा रही बेकार
निजी स्कूलों में लगभग हर साल पाठ्यक्रम बदल दिया जा रहा है। ऐसे में पुरानी किताबों बेकार हो जा रही हैं। दूसरे बच्चे इसका इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं। इस बार भी वैसी ही स्थिति है। जिले के अधिकतर स्कूलों ने पाठ्यक्रम बदल दिया है। वहीं नियमित अंतराल पर ड्रेस का कलर भी बदल दिया जा रहा है। ऐसे में पालकों को दूसरी ड्रेस की खरीदारी करनी पड़ रही है। हर साल इसके भी दाम बढ़ जा रहे हैं।

किताबों का खर्च पांच हजार रुपए तक
बुक सेट के दाम अधिक होने से अभिभावक परेशान हैं। एक पालक ने बताया कि उनकी बेटी की कक्षा छह की किताब का सेट 4500 रुपए में आया है। स्कूल फीस में भी लगातार वृद्धि हो रही है। एक सत्र का 55000 रुपए फीस है जो हमें स्टालमेंट में देना है। अभिभावकों का कहना है कि एक ही कक्षा की किताबों पर हजारों रुपये अतिरिक्त खर्च करना पड़ रहा है, जिससे मध्यमवर्गीय परिवारों पर आर्थिक दबाव बढ़ गया है। आरोप है कि किताबों के सेट पर 50 से 60 प्रतिशत तक का मार्जिन तय किया जाता है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ रहा है।

इनका कहना है…
स्कूल किसी भी पालक को निर्धारित दुकान से किताब, ड्रेस खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकते हैं। इसके अलावा अन्य बिन्दुओं का भी पालन करना अनिवार्य है। इस संबंध में जांच टीम गठित की जाएगी। पुस्तक मेला को लेकर भी मैं दिखवाती हूं।
शीतला पटले, कलेक्टर, सिवनी

Updated on:
05 Apr 2026 09:16 pm
Published on:
05 Apr 2026 09:16 pm