
शहडोल- कभी-कभी प्रकृति के ऐसे अद्भुत नजारे देखने को मिल जाते हैं, जिसे देखकर हर कोई हैरान ही रह जाता है। प्रकृति के ऐसे नजारों को देखकर चमत्कार ही लगता है। कुछ ऐसा ही अद्भुत नजारा है सोन नदी के संगम स्थल से लगभग 100 मीटर पहले, जहां देखकर ऐसा लगता है मानो यहां नक्कासी के जरिए प्रकृति ने खुद नदीं में छन्ना लगा दिया है। जिससे किसी भी तरह की गंदगी, कूड़ा, कचरा आगे ना जाने पाए।
बात कर रहे हैं मुडऩा नदी के रहिकला कुंड की, जहां किवदंती है कि नदी की गहराई का पता लगाने के लिए 12 खटिया की रस्सी भी कम पड़ गई थी। जिला मुख्यालय से लगभग 22 किलोमीटर दूर उमरिया जिले की सीमा पर रहिकला कुंड पहुंचकर ऐसा लगता है मानो नदी में प्रकृति द्वारा निर्मित पहाड़ का छन्ना लगा दिया गया है। जलस्तर कम होने पर इस छन्ने को स्पष्ट देखा जा सकता है। प्राकृतिक छन्ना इस प्रकार निर्मित है कि नदी के बीच स्थित पहाड़ी में जगह-जगह गुफा नजर आती है। लगभग ३० मीटर के दायरे में इतनी गुफाएं निर्मित हैं जिनकी गिनती करना मुश्किल है।
यहां एकाग्र होकर ध्यान से सुना जाए तो ऐसा महसूस होता है कि मानो कल-कल करती नदी के कुंड से संगीत की छटा बिखर रही है। इतना ही नहीं, यहां पत्थरों की नक्कासी देखते ही बनती है। देखने के बाद आप भी उसकी खूबसूरती को कह देखकर हैरान रह जाएंगे।
समीप ही स्थित क्षीर सागर मंदिर के पुजारी महंत केशव गिरि महाराज का कहना है कि नदी के तल से लेकर घाटों तक फैले पत्थरों के इस जाल के बारे में कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं मिलते हैं लेकिन यह कहा जा सकता है कि पूर्व के युगों में यह स्थान ऐतिहासिक रहा होगा। पत्थरों के बीच निर्मित गुफाओं से जब नदी का पानी बहता है तो होने वाली आवाज संगीत की ध्वनि जैसी सुनाई देती है। नदी में बहकर आने वाली कोई भी वस्तु असंख्य गुफाओं में ही फंसकर रह जाती है, जो क्षीरसागर संगम तक नहीं पहुंच पाती।
मुडऩा नदी के रहिकला कुंड में असंख्य गुफाएं हैं। पत्थरों के बीच इतनी बारीकी से नक्कासी कर गुफाएं बनाई गई हैं जिसका निर्माण आधुनिक तरीके से संभव नजर नहीं आता। महंत केशव गिरि का कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि पानी के तेज बहाव के कारण पत्थरों में हुए कटाव से गुफाएं निर्मित हुई होंगी। गुफाओं की बनावट ऐसी है कि यदि नदी में कोई बह गया तो उन्हीं गुफाओं में अटककर रह जाएगा।
अबतक नहीं मापी जा सकी है गहराई
महंत केशव गिरि ने बताया कि रहिकला कुंड की गहराई का अंदाजा आज तक नहीं लगाया जा सका है। आसपास के गांवों के बुजुर्ग कहते हैं कि इस कुंड की गहराई मापने में 12 खटिया में इस्तेमाल होने वाली रस्सियां कम पड़ गई थीं। हालांकि यह किवदंती है, लेकिन कुंड के समीप पहुंचकर आने वाली ध्वनि और पानी के बहाव का दृश्य देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि यहां गहराई का पता
लगा पाना कितना मुश्किल है।