
Akhilesh shukla
शहडोल- शहडोल में शिक्षा ग्रहण करने के लिए आज जो हर सुविधा उपलब्ध है। उसका सबसे बड़ा क्रेडिट पंडित शंभूनाथ शुक्ल जी को ही जाता है। हाई एजुकेशन के लिए पंडित जी को इलाहाबाद जाना पड़ा था। जिसकी टीस उन्हें हमेशा थी, और वो शहडोल में इस कमी को पूरा करना चाहते थे। जिससे यहां के लोगों को शिक्षा ग्रहण करने के लिए परेशान ना होना पड़े। और इसके लिए पंडित जी ने बहुत मेहनत की, जिसका ये प्रतिफल मिला की शहडोल में स्कूल से लेकर कॉलेज तक की कमी नहीं रही।
ऐसे खुला शहडोल में डिग्री कॉलेज
शहडोल में हाई एजुकेशन के लिए कोई व्यवस्था ना होने के चलते पंडित जी को इलाहाबाद जाना पड़ा था, इसकी पीड़ा पंडित जी को हमेशा सताती रही। पंडित जी स्वाधीनता आंदोलन के बाद विन्ध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते समय ये हमेशा सोचते रहे कि शहडोल में हाई एजुकेशन के सेंटर खोले जाएं। जिससे इस क्षेत्र के युवक भी हाई एजुकेशन हासिल कर राष्ट्रीय विकास की मुख्यधारा से जुड़ सकें। उस दौर में डॉक्टर शंकर दयाल शर्मा मध्यप्रदेश काटजू मंत्रिमंडल में शिक्षा मंत्री हुआ करते थे। शहडोल में पंडित जी डिग्री कॉलेज खोलना चाहते थे। लेकिन डॉक्टर शर्मा शिक्षामंत्री के पास फीङ्क्षडग स्कूलों के हिसाब से सतना को प्राथमिकता देने का फीड बैक दिया गया था।
शहडोल में डिग्री कॉलेज खोलने में कोई अवरोध ना आए, इसके लिए पंडित जी ने सतना में ही प्रवास किया और सतना के कॉलेज के लिए मैचिंग ग्रांट 50 हजार रुपए का फंड सतना के लोगों एवं कार्यकर्ताओं के सहयोग से बहुत कम समय में ही इकट्ठी कर ली। जिससे सतना में डिग्री कॉलेज की स्थापना की, पंडित जी ने प्रभावी पहल की जिससे शहडोल में डिग्री कॉलेज खोलने में कोई दिक्कत ना आए। 1956 में पंडित जी के प्रयासों से शहडोल में राजकीय इंटर कॉलेज उसके बाद 1958 में राजकीय महाविद्यालय शुरू हो गया। पंडित जी ने 1959 में मध्यप्रदेश के स्थापित शिक्षा शास्त्री प्रोफेसर राममित्र चतुर्वेदी को डिग्री कॉलेज का प्रथम प्राचार्य नियुक्त किया। शहडोल में डिग्री कॉलेज खुलने के बाद तो जैसे पंडित जी ने हाई एजुकेशन के लिए जो सोचा था, उसका प्रवाह शुरू हो गया था। पॉलीटेक्निक, टेक्लिकल स्कूल, आईटीआई, वन विद्यालय, पुलिस ट्रेनिंग स्कूल, पटवारी ट्रेनिंग स्कूल, संस्कृत महाविद्यालय, और बीटीआई जैसे संस्थान पंडित शंभूनाथ शुक्ल जी ने खुलवाए।
ऐसे पड़ी संस्कृत पाठशाला की नींव
पंडित शंभूनाथ शुक्ल विद्वानों और साधु सन्तों का बड़ा आदर करते थे। स्वामी अभयानंद जी जब रीवा आते थे, तब पंडित जी के बंगले में ही ठहरा करते थे, और पंडित जी स्वामी अभयानंद जी की सेवा में कोई
कसर नहीं छोड़ते थे। स्वामी जी के कहने से ही पंडित जी ने कल्याणपुर में संस्कृत पाठशाला खोली थी, जो आज संस्कृत महाविद्यालय के वट वृक्ष के रुप में फेमस है।
जब कुलपति बने पंडित जी
1972 में अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के प्रथम कुलपति बनने पर पंडित जी ने अपने 50 सालों का नॉलेज और अनुभव, राजनैतिक अनुभव का इस्तेमाल करते हुए विश्वविद्यालय को 4 साल में ही मजबूत स्थिति में पहुंचा दिया।
अंचल में स्कूलों की बाढ़ आई
शहडोल अंचल में प्राथमिक, माध्यमिक और हायर सेकेंडरी स्कूल खुलने की पंडित शंभूनाथ शुक्ल जी के कार्यकाल में जैसे बाढ़ सी आ गई। जहां सरकारी विद्यालय खुलवाना शीघ्र संभव नहीं होता था वहां जनसहयोग से अशासकीय विद्यालय खुलवाने और उसे बिना किसी अवरोध के मान्यता दिलाने का कार्य पंडित जी ने एक महायज्ञ के रूप में किया। सन् 1972 में अनुपपुर में तुलसी महाविद्यालय पंडित जी के प्रयासों से ही खुला। शहडोल में विधि महाविद्यालय को शुरू करने की मान्यता 1960-61 में पंडित शंभूनाथ शुक्ल के ही प्रयासों से मिली।