
शहडोल. शहडोल आज विकास के पथ पर है, संभाग के साथ-साथ यहां मेडिकल कॉलेज, इंजीनियरिंग कॉलेज, यूनिवर्सिटी जाने क्या-क्या नहीं है। पंडित शंभूनाथ शुक्ल के नाम पर जो कॉलेज पिछले कई सालों से चल रहा था। आज वो भी यूनिवर्सिटी में तब्दील हो चुका है। इसी शहडोल को पहचान देने वाले, विकास कार्य करने वाले पंडित शंभू नाथ शुक्ल का जन्म 18 दिसंबर 1903 को हुआ। पंडित शंभूनाथ शुक्ल के पिता पंडित माताप्रसाद शुक्ल प्रतापगढ़ निवासी सरयूपारीण ब्राम्हण थे, जो ठेकेदारी के व्यवसाय से शहडोल आए थे। 1875 में वे शहडोल में बस गए थे।
पंडित शंभूनाथ शुक्ल जी के माता जी का नाम बतासा देवी था। सामंतवादी शासन व्यवस्था में सार्वजनिक स्कूलों का उस दौर में बहुत अभाव था। कुछ संपन्न वर्ग के लोग व्यवसायी एवं इलाकेदार अपने बच्चों को पढ़ाने के लिए शिक्षक की व्यवस्था करते थे। इस तरह से प्राथमिक शिक्षा देने के बाद उन्हें हाई एजुकेशन के लिए बाहर भेज देते थे। इन परिस्थितियों में भी छोटी आय होने के बाद भी पंडित शंभूनाथ शुक्ल के पिता ने अपने बच्चों को पढ़ाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी।
पंडित जी की पढ़ाई
प्राथमिक शिक्षा के बाद हाई एजुकेशन के लिए पंडित शंभूनाथ शुक्ल को इलाहाबाद भेजा गया। कई बाधाओं के बाद भी पंडित शंभूनाथ शुक्ल को उनके पिता ने उच्चस्तरीय पढ़ाई के लिए इलाहाबाद भेजा, हलांकि शुक्ल जी को इलाहाबाद में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई, क्योंकि उनके बड़े भाई पंडित द्वारिका प्रसाद शुक्ल अग्रवाल इंटर कॉलेज में अध्यापक थे। जिसके कारण उन्हें वहां रहकर पढऩे मेें कोई दिक्कत नहीं हुई।
डीएवी स्कूल से हाई स्कूल इंटर, गवर्मेंट कॉलेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा उत्तीर्ण किया। प्रयाग विश्वद्यिालय इलाहाबाद से सन् 1926 में बीए और सन 1928 में एलएलबी की डिग्री हासिल कर ली। इसके बाद सन् 1929 में ही इलाहाबाद में पंडित जी ने वकालत की शुरुआत कर दी। इतना ही नहीं 1930 में मुंसिफ मजिस्ट्रेट बुढ़ार जिला शहडोल में वकालत प्रारंभ कर दिया।
महज साढ़े 12 साल में शादी
पंडित शंभूनाथ शुक्ल की शादी महज साढ़े बारह साल की ही उम्र में कर दिया गया। सन् 1916 में पंडित जी का विवाह ग्राम हटवा जिला बांदा उत्तरप्रदेश के जागीरदार पंडित रामेश्वरदयाल मिश्र की सुपुत्री रमाबाई के साथ हुआ।
राजनीतिक सफर की शुरुआत
पढ़ाई के दौरान ही महज 17 की साल की उम्र में ही पंडित शंभूनाथ शुक्ल भी महात्मा गांधी के आव्हान पर सन् 1920 में असहयोग आंदोलन में कूद पड़े और पहली बार जेल यात्रा भी की। दूसरी बार सन् 1930 में असहयोग आंदोलन में हिस्सा लेने के चलते वे जेल भी गए और उसी साल बघेलखंड जिला कॉग्रेस कमेटी में शामिल भी हो गए।
सन् 1932-34 में कांग्रेस आंदोलन में भाग लेने से रीवा रियासत की सरकार ने नजरबंद किया। मार्च 1934 तक राजनैतिक बन्दी बनाकर बिना मुकदमा चलाए बांधवगढ़ और माधवगढ़ की जेल में रखा गया। सन् 1934 में जेल से मुक्त होने के बाद फिर से वकालत शुरू कर दी। सन् 1936 में बघेल खंड कांग्रेस कमेटी के मंत्री भी चुने गए।
1937 में अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के सदस्य निर्वाचित हुए। 1940 से 46 तक बघेल खंड जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष पद पर रहे। 1945 में रीवा माहाराजा के कानूनी सलाहकार नियुक्त किए घए। 25 अप्रैल 1947 को गठित रीवा राज्य कौंसिल ऑफ मिनिस्टर्स में स्थान मिला। जिमसें पंडित जी को खाद्य मंत्री चुना गया। पंडित जी 1948 से 52 तक विंध्य प्रदेश कांग्रेस कमेटी के निर्विरोध अध्यक्ष निर्वाचित हुए। 1948 से 52 तक संविधान परिषद और अंतरिम संसद के सदस्य रहे।
जब मुख्यमंत्री बने पंडित जी
वर्ष 1952 में विंध्यप्रदेश विधानसभा शहडोल जिले के अमरपुर विधानसभा क्षेत्र से सदस्य निर्वाचित हुए और विन्धप्रदेश के निर्विरोध मुख्यमंत्री बने। इस पद पर 31 अक्टूबर 1956 तक जबतक नए मध्यप्रदेश का गठन नहीं हुआ तब तक बने रहे। 1956 से नए मध्यप्रदेश में पंडित जी 56 से 76 तक निरंतर वन, नैसर्गिक साधन, सिंचाई, सहकारिता, शिक्षा, लोक निर्माण और वित्त विभाग के मंत्री पद पर रहे। सन् 67 में रीवा में लोकसभा के लिए टिकट मिला और वे भारी मतों से विजयी रहे। सांसद रहते हुए उन्हें 1967 में गांधी शताब्दी समारोह समिति का अध्यक्ष मनोनीत किया गया।
पंडित शंभूनाथ शुक्ल को अपने लंबे राजनीतिक जीवन में पहली बार सन् 1971 के लोक सभा के पहले मध्यावधि चुनाव में रीवा संसदीय क्षेत्र से रीवा के महाराजा मार्तण्ड सिंह से हार का सामना करना पड़ा। विंध्य के पहले मुख्यमंत्री होने के बाद भी जब मध्यप्रदेश बना तो उन्होंने महत्वाकांक्षा को परे रखते हुए त्याग की भावना दिखाई और इस तरह मध्यप्रदेश के पहले मुख्यमंत्री के रूप में पं. रविशंकर शुक्ल की ताजपोशी की गई।
जब कुलपति बने पंडित जी
इंदिरा गांधी की अनुशंसा पर मध्यप्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल सत्यनारायण सिन्हा ने उन्हें 15 अगस्त सन 1971 को अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा का प्रथम कुलपति नियुक्त किया।
पंडित जी का अंतिम समय
अगस्त 1973 को उनकी पत्नी रमाबाई का निधन हो गया। पत्नी के निधन ने पंडित जी को झकझोर दिया। 15 अगस्त 1975 को पंडित जी योजना मंडल के सदस्य चुने गए। 1973 में धर्मपत्नी के निधन के बाद उन्हें अकेलापन सताने लगा। वो अस्वस्थ रहने लगे। लेकिन जीवन के अंतिम क्षण तक लड़ाई करते रहे । 21 अक्टूबर 1978 को रात 9 बजकर 55 मिनट पर भोपाल के हमीदिया अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली।