
शहडोल- आदिवासी अंचल में प्रतिभाओं की कमी नहीं है, हौसला भी भरपूर है लेकिन सुविधाएं और इन्फ्रास्ट्रक्चर न होने से खिलाड़ी बहुत आगे नहीं बढ़ पाते हैं। अपने दम पर जैसे-तैसे स्कूल में नेशनल तक खेल आते हैं लेकिन आगे की लड़ाई लडऩे में उनका हौसला जवाब दे जाता है। हालांकि कुछ खिलाडिय़ों ने बीड़ा उठाया है लेकिन दुश्वारियां पहाड़ जैसी हैं और समर्थन राई के बराबर भी नहीं।
ऐसी स्थिति में एथलेटिक्स में स्कूल स्तर पर अच्छी सुविधाओं के लिए शहडोल अंचल को बहुत बड़ी लड़ाई लडऩी है। अगर बच्चों को स्कूलों में शुरुआत से ही प्रोफेशनल तरीके से ट्रेनिंग मिले तो इस ट्राइबल एरिया से भी अच्छे खिलाड़ी निकल सकते हैं। जो स्टेट और नेशनल ही क्या ओलंपिक में भी मेडल हासिल कर सकते हैं। बस एथलेटिक्स के लिए सही इंन्फ्रास्ट्रक्चर की जरूरत है।
सुविधाएं मिलें तो मेडल जरूर जीतूंगा : शिवम
17 साल के शिवम सिंह एथलीट हैं, 400 मीटर रनिंग के खिलाड़ी हैं और इनका भी सपना है कि ये अपने खेल के दम पर भारत का नाम रोशन करें, इंटरनेशनल लेवल पर मेडल हासिल करें। अपने सपने को बयां करते-करते शिवम सिंह मायूस हो जाते हैं। कहते हैं, तैयारी कहां करें ? हमारे पास तो ग्राउंड ही नहीं है। यहां हम नॉर्मल मैदान पर दौड़ते हैं, लेकिन जैसे ही यहां से बाहर जाते हैं तो वहां हमें सिंथेटिक ट्रैक मिलती है, स्पाइक्स पहनने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में हम पिछड़ जाते हैं। शिवम सिंह स्कूल नेशनल खेल चुके हैं, लेकिन अब आगे बढऩे के लिए सुविधाएं और गाइडेंस चाहिए।
एक दिन मेडल जरूर जीतूंगी : साक्षी
गांधी स्टेडियम में एथलीट साक्षी सिंह दोस्तों के साथ दौड़ते हुए एंट्री करती हैं। जब उनसे उनके खेल के बारे में पूछा गया, तो बड़े ही खुशी के साथ बताती हैं कि वो स्कूल लेवल में तो स्टेट तक ही जा सकी हैं। लेकिन ओपन नेशनल खेल चुकी हैं। इससे आगे ? इस सवाल पर मायूस हो गईं। साक्षी ने बताया कि हमें ऐसी परिस्थितियों में खेलना पड़ता है, जिसका हमें अभ्यास नहीं होता। यहां हम सिंथेटिक ट्रैक और
स्पाइक्स की सोच भी नहीं सकते। साक्षी 100 मीटर रेस की एथलीट हैं, और हर दिन शहडोल के गांधी स्टेडियम में अभ्यास करने आती हैं इस उम्मीद के साथ की एक दिन वो इंटरनेशनल लेवल पर मेडल जरूर हासिल करेंगी।
प्रतिभाओं की कमी नहीं है : रहीम खान
मोहम्मद रहीम खान स्कूल के खिलाडिय़ों को ट्रेंड करते हैं। शहडोल के ज्यादातर युवा खिलाडिय़ों के संपर्क में रहते हैं। रहीम उनकी समस्याओं को अच्छी तरह से जानते हैं। बताते हैं कि हाई जंप के लिए रस्सी बांधकर रेत में अभ्यास कराया जाता है। जिसकी वजह से हाई जंप की कई तकनीक तो यहां के एथलीट सीख ही नहीं पाते हैं। उनके सामने अच्छी तकनीक के माध्यम से ट्रेंड किए गए खिलाड़ी आते हैं। हम लोग यहीं पर पिछड़ जाते हैं। ये केवल हाई जंप में ही नहीं है, ये तो एक खेल का उदाहरण है, यहां एथलेटिक्स में अधिकतर खेलों का यही हाल है। और यही सबसे बड़ी वजह भी है जो यहां से एथलेटिक्स के खिलाड़ी नहीं निकल पाते हैं।
टैलेंट हैं, सुविधाएं भी बढऩी चाहिए : धीरेन्द्र
खेल विभाग के एथलेटिक्स कोच धीरेंन्द्र सिंह के मुताबिक यहां के बच्चे टैलेंटेड हैं, लेकिन यहां के पैरेंट्स का एथलेटिक्स में उतना इंट्रेस्ट नहीं है, ग्राउंड नहीं है, खिलाडिय़ों की डाइट की समस्या भी होती है, वेल प्रोफेशनल कोचिंग के हिसाब से एक खिलाड़ी को जो सामग्री चाहिए वो भी नहीं मिल पा रही, जिसकी वजह से बच्चे आगे नहीं बढ़ पा रहे हैं। जब बच्चा सिंथेटिक ग्राउंड में प्रैक्टिस नहीं करेगा, तो वो कैसे स्टेट लेवल में परफॉर्म कर पाएगा।