जयपुर

खंडेला विधायक को लालबत्ती मिलने से बाजौर गुट हुआ मजबूत, इस गुट को लगा बड़ा झटका

खण्डेला को लाल बत्ती मिलने से बाजौर गुट मजबूत हुआ है। जबकि यह खर्रा गुट के लिए बड़ा झटका है। पिछले कई महीनों से चल रही मंत्रिमण्डल फेरबदल की दौड़ में श्रीमाधोपुर विधायक व भाजपा जिलाध्यक्ष झाबर सिंह खर्रा का भी नाम था। लेकिन आखिरी समय में उनका नाम सूची से आऊट हो गया।
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Updated: 11 Dec 2016, 5:31 PM IST
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खंडेला विधायक बंशीधर खण्डेला राज्य मंत्रिमण्डल में जगह बनाने में सफल हुए हैं। पहली बार मंत्री बने खण्डेला को चिकित्सा राज्य मंत्री बनाया गया है। शनिवार सुबह मुख्यमंत्री कार्यालय ने खण्डेला को जयपुर बुला लिया। राजनैतिक जानकारों का कहना है कि खर्रा के तिवाड़ी गुट से जुड़े होने के कारण वह मंत्रिमण्डल में जगह नहीं बना सके। खंडेला के मंत्री बनाए जाने की जानकारी मिलने पर भाजपाईयों ने आतिशबाजी कर जमकर जश्न मनाया। देर शाम जिले के वरिष्ठ भाजपा नेता भी जयपुर पहुंचे और आलाकमान का आभार जताया।

शेखावाटी जाट बाहुल्य क्षेत्र है। लेकिन सरकार में यहां से किसी भी जाट को लाल बत्ती नहीं दी गई थी। ऐसे में मुख्यमंत्री ने अब जाटों को खुश करने के लिए खंडेला पर दांव खेला है। क्योकि पिछली सरकार में केन्द्र व राज्य में कई अहम पदों की जिम्मेदारी जाट नेताओं के पास थी।

पूर्व केन्द्रीय मंत्री सुभाष महरिया ने पिछले दिनों कांग्रेस का दामन थाम लिया था। इसके बाद भाजपा में जाट नेता के तौर पर किसी भी विधायक की छबि नहीं थी। ऐसे में पिछले दिनों आलाकमान ने पूर्व जिलाध्यक्ष हरिराम रणवां को यूआईटी चेयरमैन बनाकर जाट नेता के तौर पर काम करने की नसीहत दी। अब स्पष्ट संकेत है कि वह भाजपा किसी भी तरह महरिया की कमी को चुनाव से पहले पूरा करना चाहती है।

खंडेला दूसरी बार विधायक है। इस कारण संगठन ने सीनियर होने का भी ध्यान रखा है। पहले श्रीमाधोपुर विधायक झाबर सिंह खर्रा को मंत्री बनाए जाने की भी चर्चा थी। लेकिन आखिरी समय में खर्रा को सूची से बाहर कर दिया गया। जिले के सीनियर विधायक बाजौर को सरकार पहले ही लाल बत्ती दे चुकी है।

आगे क्या: अब जिलाध्यक्ष होगा सवर्ण जाति का

सीकर जिले में फिलहाल भाजपा जिलाध्यक्ष भी जाट है। सरकार ने जाटों को खुश करने के लिए खंडेला विधायक को चिकित्सा मंत्री बनाकर लाल बत्ती दे दी है। वहीं पूर्व जिलाध्यक्ष हरिराम रणवां को पिछले दिनों यूआईटी चेयरमैन बना दिया गया। ऐसे में अब खर्रा से जिलाध्यक्ष की कुर्सी छीनना तय हो गया है। ऐसे में किसी सवर्ण जाति के नेता को जिलाध्यक्ष की कमान सौपी जा सकती है। इसकी दौड में दो नाम काफी आगे है।

बढ़ी मुसीबत: कैसे बनाएंगे गुटों में संतुलन

गुटबाजी की इस जंग में बाजौर गुट का पलड़ा भारी हो गया है। जबकि खर्रा गुट बेहद ही कमजोर हो गया है। ऐसे में आलाकमान के सामने बड़ी चुनौती है कि वह कैसे दोनों गुटों के बीच में बैलेंस बनाएंगी। क्योकि खर्रा गुट भी जिले में बड़ा प्रभाव रखता है। यदि यह गुट नाराज होता है तो भाजपा को आगामी चुनाव में बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। हालांकि चर्चा यह भी है कि खर्रा को आलाकमान प्रदेश संगठन में जिम्मेदारी या कोई विशेष जिम्मेदारी दे सकता है।

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