
दीपोत्सव सनातन धर्म का सबसे बड़ा त्योहार - demo pic
प्रकाश का त्योहार दीपावली भारत में जीवन को उत्सव के रूप में मनाने का एक सबसे बड़ा अवसर है। यह बुराई पर अच्छाई की जीत, स्त्री शक्ति - काली, धन्वंतरि, आयुर्वेद की परंपरा और सबसे बढक़र धन और कल्याण की देवी लक्ष्मी का उत्सव है। कार्तिक अमावस्या पर दिवाली का त्योहार हमारे देश भारत जितना ही प्राचीन है।
दिवाली केवल हिंदू धर्मावलम्बियों का ही नहीं, बल्कि भारतीय मूल की और दुनिया भर में फैली तीन अन्य धार्मिक परंपराओं का भी त्योहार है। जैन, बौद्ध और सिख धर्म भी अपने-अपने कारणों से इस त्योहार को मनाते हैं।
दिवाली भारत के जन-जन के मन में बसे मर्यादा पुरूषोत्तम राम के कठिन वनवास के समापन के उपलक्ष्य में मनाई जाती है। अयोध्या पहुंचने पर, सरयू नदी के तट पर स्थित उनकी राजधानी को घी से भरे धरती मां की मिट्टी के दीयों से रोशन किया गया था। तब से, दिवाली विष्णु के अवतार भगवान राम जो एक आदर्श पुत्र तो थे ही और आदर्श राम राज्य भी स्थापित किया था उनके अयोध्या वापसी पर मनाया जाने वाला वार्षिक उत्सव बन गया है। शायर इकबाल ने लिखा था: है राम के वजूद पे हिंदोस्तां को नाज, अहले नजर समझते हैं उनको इमाम-ए-हिंद।
अर्थात् भारतीयों को राम की विशाल हस्ती, व्यक्तित्व और कृतित्व पर गर्व है और भारत के लोग उन्हें अब तक का सबसे महान ईश्वर का अवतार मानते हैं।
एक आदर्श पुत्र, पति और राजा, भगवान राम भारतीय जीवन के हर पहलू में ‘धु्रव तारे’ की तरह चमकते हैं। भारतीयों के हृदय में भगवान राम के प्रति जो सम्मान और आदर है, वह अनादि काल से कभी कम नहीं हुआ है। जैन धर्म में, दीपावली उस दिन का स्मरण करती है जब भगवान महावीर ने निर्वाण प्राप्त किया था, जो पुनर्जन्म के चक्र से परम मुक्ति है। भगवान महावीर ने 15 अक्टूबर, 527 ईसा पूर्व को बिहार के नालंदा स्थित पावापुरी में दिवाली के दिन ही निर्वाण प्राप्त किया था। आचार्य यतेवर्षभ द्वारा रचित तिलोयपणति के अनुसार, वह कार्तिक मास की चतुर्दशी का दिन था।
भगवान महावीर वर्तमान ब्रह्मांडीय युग में जैन धर्म के 24वें और अंतिम तीर्थंकर थे जिन्होनें उस जैन परम्परा को पुनसर््थापित किया जैसी कि हम आज देखते हैं। यह भी माना जाता है कि भगवान महावीर के प्रमुख शिष्य, गणधर गौतम स्वामी को भी दीपावली के दिन पूर्ण ज्ञान, जिसे केवल्य ज्ञान कहा जाता है, प्राप्त हुआ था। जैन परम्परा में दीपावली न केवल भगवान महावीर की शिक्षाओं का उत्सव है, बल्कि व्यापक मानवता के लिए उनके योगदान का भी उत्सव है। उनकी शिक्षाएं. अहिंसा, अपरिग्रह और वर्तमान संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण अनेकांतवाद की अवधारणा के माध्यम से अन्य धार्मिक परंपराओं का सम्मान, करुणा और न्याय को बढ़ावा देती हैं।
बौद्ध परम्परा में भी दिवाली के त्यौहार का महत्व है। ऐसा माना जाता है कि गौतम बुद्ध ज्ञान प्राप्ति के बाद पहली बार इसी दिन अपने जन्मस्थान कपिलवस्तु आए थे। कपिलवस्तु के आम लोगों ने दीप जलाकर उनके आगमन पर खुशी व्यक्त की थी जैसे भगवान राम के अयोध्या लौटने पर थी। भगवान बुद्ध ने अपने संबोधन में उन्हें ‘अप्प दीपो भव’- ‘अपने जीवन का प्रकाश स्वयं बनो’ का उपदेश दिया था।
बौद्ध मत में यह भी माना जाता है कि वह दिवाली का दिन था जब कलिंग युद्ध के बाद, बौद्ध भिक्षु तीषु की सलाह पर सम्राट अशोक ने अपने हथियार त्याग दिए थे। हालांकि कुछ ग्रंथों का मत है कि वह विजयदशमी का दिन था। अब धर्मनिष्ठ बन चुके सम्राट राजा अशोक ने बौद्ध धर्म, अहिंसा और सादे जीवन का प्रचार करना शुरू कर दिया। नेपाल में बौद्ध धर्मावलम्बी दिवाली को ‘तिहार पर्व’ के रूप में मनाते हैं, जो पांच दिनों का उत्सव है। इन पांच दिनों में, बौद्ध धर्मावलम्बी कौए, श्वान, गाय और बैल की एक-एक दिन पूजा करते हैं और अंतिम दिन ‘भाई टीका’ के रूप में मनाया जाता है।
चीनी विद्वान हुआन सांग ने लिखा है कि दिवाली के अवसर पर एक शोभा यात्रा निकाली जाती थी, जिसमें गौतम बुद्ध की एक बड़ी मूर्ति और उसके बाद सम्राट अशोक की एक छोटी मूर्ति होती थी। सिख इतिहास और परंपराओं के अनुसार, सिखों के छठे गुरु, गुरु हरगोबिंद जी ने सबसे पहले लोहगढ़ किला बनवाया और फिर स्वर्ण मंदिर में अकाल तख्त को लौकिक शक्ति का केंद्र बनाया, जो संप्रभुता और स्वायत्तता का प्रतीक था। तत्कालीन मुगल शासक जहाँगीर को उनकी लोकप्रियता और सैन्य शक्ति से इतना डर लगा कि उसने गुरु हरगोबिंद जी को ग्वालियर किले में बंदी बना लिया।
इस कारावास के कारण गुरुजी के अनुयायियों में बढ़ते आक्रोश को देखते हुए, प्रमुख सूफी संत मियां मीर ने जहांगीर पर गुरु जी को रिहा करने का दबाव डाला। लेकिन जब रिहाई का आदेश एक विशेष दूत के साथ ग्वालियर किले में पहुंचा तो गुरु हरगोबिन्द जी ने तब तक रिहा होने से इनकार कर दिया जब तक कि वहां बंदी बनाए गए 52 अन्य रियासतों के राजाओं को भी रिहा नहीं कर दिया जाता। लेकिन राजकीय आदेश में उनकी माँग पर एक असामान्य शर्त रख दी गयी कि उन राजाओं में से जो भी गुरू जी द्वारा पहने हुये ढीले चोले की डोरी पकड़ पाएगा, उसे ही रिहा किया जाएगा।
गुरु हरगोबिंद जी ने 52 बेल्ट - लडिय़ों - वाला एक बड़ा विशेष ‘चोला’ मंगवाया, जिसे उन्होंने अपनी रिहाई के समय पहना और 52 राजा इन 52 लडिय़ों को पकड़ कर उनके पीछे-पीछे चले। वाहे गुरू (ईश्वर) का धन्यवाद करने के लिये अब गुरु हरगोबिंद जी और वे 52 राजा अमृतसर के स्वर्ण मंदिर पहुंचे उस दिन दिवाली का ही दिन था। इस अवसर पर पूरे हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मन्दिर) को दीपों की रोशनी से सजाया गया था और उनके आगमन का भव्य और पवित्र तरीके से उत्सव मनाया गया। तब से, हर साल दिवाली के दिन स्वर्ण मंदिर को रोशनी से सजाया जाता है और गुरु जी के आगमन के उपलक्ष्य में ‘बंदी छोड़ दिवस’ - कैदी राजाओं की रिहाई - के रूप में मनाया जाता है। उत्तर भारत में एक लोकप्रिय कहावत है कि ‘दाल रोटी घर की, दिवाली अमृतसर की’ अर्थात ‘घर के बने खाने और अमृतसर की दिवाली से बढक़र कुछ नहीं हो सकता’। दुनिया भर के सभी गुरुद्वारे, जिनमें पवित्र हरमंदिर साहिब (स्वर्ण मंदिर, अमृतसर) भी शामिल है, दिवाली पर रोशनी, मोमबत्तियों और दीयों से जगमगाते हैं। दिवाली उत्सव का समय भी है क्योंकि किसानों के पास अपनी खुशी व्यक्त करने और पिछले मौसम की भरपूर फसलों के लिए देवताओं को धन्यवाद देने के कई कारण होते हैं। रोशनी का त्योहार दिवाली प्रकाश, आनंद, भाईचारे और सबसे बढक़र समस्त जीवन के प्रति सम्मान के माध्यम से हमारे आसपास की दुनिया को हरसंभव तरीके से रोशन करने का समय है। हम कह सकते हैं कि दिवाली भारतीय मूल की सभी धार्मिक परंपराओं के बीच एक अंतर-धार्मिक त्योहार रहा है और सभी अपने-अपने और अलग-अलग कारणों से इस त्योहार को मनाते हैं। आज के संघर्ष, वैमनस्य, युद्ध और अशांति के दौर में, दीपावली भाईचारा, मानव जीवन के प्रति सम्मान और सभी प्रकार के कलह, रक्तपात और अन्याय के अंत के साथ प्रकाश, उत्साह व उत्सव के रूप में जीवन जीने की प्रेरणा देता है।
जसबीर सिंह, पूर्व अध्यक्ष, राजस्थान अल्पसंख्यक आयोग
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Updated on:
6 Nov 2026, 5:53 PM IST
Published on:
6 Nov 2026, 5:53 PM IST




