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संस्कृति, स्वदेशी और पर्यावरण संरक्षण में सहभागी बनें

मिट्टी के दीपक जलाने का एक सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी है। दीपावली से पहले कुम्हार महीनों तक दीपक बनाने की तैयारी करते हैं। मिट्टी को आकार देकर, उन्हें सुखाकर और पकाकर तैयार किए गए दीपकों की बिक्री से हजारों परिवारों की आजीविका चलती है।
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भारत

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Opinion Desk

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बाबूलाल जाजू

•

Updated: 5 Nov 2026, 3:04 PM IST

diyas

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भारत में दीपावली ऐसा पर्व है, जो अंधकार पर प्रकाश, निराशा पर आशा और बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक माना जाता है। इस दिन घरों, मंदिरों और प्रतिष्ठानों में दीप जलाकर खुशियां मनाने की परंपरा है। बदलते समय के साथ दीपावली मनाने के तौर-तरीकों में भी बदलाव आया है। मिट्टी के पारंपरिक दीपकों की जगह रंग-बिरंगी बिजली की झालरों, आकर्षक बल्बों और चाइनीज सजावटी लाइटों ने ले ली है।ऐसे में पर्यावरण संरक्षण की दृष्टि से एक बार फिर मिट्टी के दीपों की परंपरा को अपनाने की जरूरत है। तेल और रुई की बाती से मिट्टी के दीप जलाना केवल धार्मिक आस्था और मांगलिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्रकृति के साथ हमारे पारंपरिक जुड़ाव का भी प्रतीक है। दीपक में उपयोग होने वाली मिट्टी प्राकृतिक तत्व है और तेल तथा रुई भी प्राकृतिक स्रोतों से प्राप्त होते हैं। इसके विपरीत प्लास्टिक से बनी सजावटी लाइटें और सस्ते इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद उपयोग के बाद कचरे का रूप ले लेते हैं, जिनका निस्तारण पर्यावरण के लिए चुनौती बनता जा रहा है।

आज दीपावली पर बिजली की झालरों और तेज रोशनी का चलन तेजी से बढ़ा है। अत्यधिक कृत्रिम रोशनी से रात में सक्रिय रहने वाले कीट-पतंगों और अन्य जीवों पर प्रभाव पड़ता है। रोशनी की ओर आकर्षित होकर अनेक कीट बिजली के खंभों और प्रकाश स्रोतों के आसपास एकत्रित हो जाते हैं। इससे उनकी प्राकृतिक गतिविधियां प्रभावित होती हैं। मिट्टी के दीपक जलाने का एक सामाजिक और आर्थिक पक्ष भी है। दीपावली से पहले कुम्हार महीनों तक दीपक बनाने की तैयारी करते हैं। मिट्टी को आकार देकर, उन्हें सुखाकर और पकाकर तैयार किए गए दीपकों की बिक्री से हजारों परिवारों की आजीविका चलती है।

जब हम बाजार से मिट्टी के दीपक खरीदते हैं तो किसी स्थानीय कारीगर की मेहनत को सम्मान देने के साथ उसकी आर्थिक स्थिति मजबूत करने में भी योगदान देते हैं। इसके विपरीत चाइनीज सजावटी उत्पादों पर बढ़ता खर्च स्थानीय हस्तशिल्प व पारंपरिक व्यवसायों को प्रभावित करता है। इस दीपावली पर चाइनीज लाइटों और कृत्रिम सजावटी उत्पादों के स्थान पर अधिक से अधिक मिट्टी के दीपक खरीदें और अपने घर-आंगन को पारंपरिक रोशनी से सजाएं और अनावश्यक बिजली की खपत से भी बचने का प्रयास करें। यदि प्रत्येक परिवार कुछ मिट्टी के दीपक जलाने, स्थानीय कारीगरों से खरीदारी करने और पर्यावरण के प्रति जिम्मेदार व्यवहार अपनाने का संकल्प ले तो यह छोटा-सा प्रयास बड़े बदलाव का आधार बन सकता है। इस बार दीपावली पर मिट्टी के दीप जलाकर अपनी संस्कृति, स्वदेशी कारीगरों और पर्यावरण तीनों के संरक्षण में सहभागी बनें।

बाबूलाल जाजू,(पर्यावरणविद्)