
क्या हम रायपुरवासी अंधे-बहरे हैं? यह सवाल इसलिए उठ रहा है कि राजधानी रायपुर के फाफाडीह चौक के सिग्नल पर विगत दिवस एक एंबुलेंस फंस गई थी। मरीज को लेकर अस्पताल जा रहा एंबुलेंस का ड्राइवर वहां खड़े लोगों को रास्ता देने के लिए लगातार सायरन बजाता रहा... लेकिन मजाल है कि कोई भी टस से मस हो जाता। जैसे-जैसे ट्रैफिक धीरे-धीरे आगे सरकता गया, एंबुलेंस भी धीरे-धीरे आगे बढ़ी।
एंबुलेंस आपातकालीन वाहन सेवा है, जिसका सीधा संबंध सड़क पर इंसानियत के साथ जिम्मेदारी और अनुशासन से है। जब कोई एंबुलेंस सायरन बजा रही है, तो इसका मतलब हुआ कि वह मौत से संघर्ष कर रहे किसी इंसान की जिंदगी बचाए रखने के लिए दौड़ रही है। ऐसे में एक सभ्य समाज का दायित्व है कि वह एंबुलेंस को तुरंत रास्ता दे और अन्य लोगों से भी रास्ता दिलवाना चाहिए।
हम लोग जब सड़कों पर वाहन लेकर निकलते हैं तो बदहाल ट्रैफिक व्यवस्था और जाम के बीच जहां भी जगह मिले निकलने की कोशिश करते हैं। इससे होता यह है कि वाहन एक के बाद एक फंसते चले जाते हैं और लोग एक-दूसरे लड़ने-भिड़ने लगते हैं। ट्रैफिक सिविक सेंस लोगों में होना बहुत जरूरी है। अगर सभी लोग अपनी कतार में चलते रहें, तो जल्दी वहां से निकल सकते हैं, जिससे ट्रैफिक जाम भी नहीं होगा। ऐसा करने से हम सभी का समय भी बचेगा।
एक बात और यह है कि क्या ट्रैफिक विभाग का काम सीसीटीवी में देखकर सिर्फ चालान काटना और पैसे वसूलना है। स्मार्ट पुलिसिंग और स्मार्ट ट्रैफिक सिस्टम तो यह होगा कि अगर एंबुलेंस, फायरब्रिगेड जैसे आपातकालीन सेवा के वाहन कहीं फंसे हुए दिख रहे हैं तो ट्रैफिक विभाग को सीसीटीवी में देखकर तुरंत नजदीकी थाना या पुलिस चौकी से वहां किसी को भेजकर व्यवस्था बना दे। शासन-प्रशासन को भी इस ओर विशेष ध्यान देना चाहिए।-अनुपम राजीव राजवैद्य anupam.rajiv@in.patrika.com
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Updated on:
6 Nov 2026, 2:29 AM IST
Published on:
6 Nov 2026, 2:29 AM IST




