
Chittorgarh Crime : प्रतीकात्मक ग्राफिक्स फाइल फोटो पत्रिका।
सात वर्षीय मासूम बालिका से बलात्कार के दोषी को सजा सुनाते वक्त राजस्थान में बाड़मेर की पॉक्सो कोर्ट के न्यायाधीश का पीडि़ता से माफी मांगना न केवल संवेदनशीलता का परिचायक है, बल्कि उन जिम्मेदारों को उस घोर लापरवाही का अहसास कराने वाला भी है, जिसकी वजह से बच्चियां अपने घर के पास तक सुरक्षित नहीं रह पातीं। न्यायाधीश ने कहा भी कि यह माफी समाज, पुलिस और प्रशासन की ओर से है।
जाहिर है कानून के सख्त प्रावधानों के बावजूद नाबालिग बालिकाएं आए दिन दरिंदों का शिकार बनती आ रही हैं। ऐसे में पुलिस के निगरानी तंत्र पर सवाल तो उठता ही है समाज भी कम भागीदार नहीं है, जिसकी अनदेखी ऐसे अपराधों को बढ़ावा देती है। सरकारी आंकड़े बच्चियों के साथ अपराध की भयावहता बताने को काफी हैं। राजस्थान मेेंं वर्ष 202६ के शुरुआती चार माह में ही पॉक्सो से जुड़े 549 मामले दर्ज हो चुके थे। बलात्कार व छेड़छाड़ के दूसरे मामले भी कम होने का नाम नहीं ले रहे।
इसमें दोराय नहीं कि बाड़मेर के इस प्रकरण में पुलिस ने आरोपी की गिरफ्तारी व चालान पेश करने में तत्परता दिखाई। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम बच्चियों को सुरक्षित वातावरण दे पा रहे हैं? शहर-गांवों में सीसीटीवी कैमरे लगवाने व बालिकाओं के स्कूल आने-जाने के समय पर विशेष निगरानी के निर्देश भी आखिर अदालत को ही क्यों देने पड़ते हैं? क्या यह बंदोबस्त पुलिस-प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए। फिर भी यह सवाल अपनी जगह कायम है कि क्या केवल कठोर सजा से ही बेटियां सुरक्षित हो जाएंगी? पिछले वर्षों में बलात्कार के अपराधों के लिए सजा कठोर हुई है। फास्ट ट्रैक अदालतें बनी हैं, कानूनों में संशोधन तक हुए हैं। इसके बावजूद ऐसी घटनाएं रुक नहीं रही हैं। सीधे तौर पर यह अपराध एक कानूनी समस्या ही नहीं, बल्कि सामाजिक विकृति का परिणाम भी है। इसलिए न्यायाधीश की इस माफी में हर वह व्यक्ति अपने को शामिल माने, जो जिम्मेदारियों के निर्वहन में कोताही बरत रहा है।
Updated on:
5 Nov 2026, 8:34 PM IST
Published on:
5 Nov 2026, 8:34 PM IST
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