सीकर

लावारिस नवजात का शहरवासियों ने मनाया जन्मोत्सव समाज को दिया संदेश

पालना से मिलेगा नया जीवन, अपराध पर लगाम जरूरी
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Updated: 11 Dec 2017, 1:01 PM IST
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सीकर. जिसका कोई नहीं उसका तो खुदा है यारो, मैं नहीं कहता किताबों में लिखा है यारों। अमिताभ बच्चन पर फिल्माया गया यह गीत रविवार को सीकर के सरकारी जनाना अस्पताल में भी गुनगुनाया गया। क्योंकि मौका ही कुछ ऐसा विशेष था कि जिस बच्ची को जन्म देते ही उसके माता-पिता लावारिस छोड़ गए थे। उस मासूमसी बच्ची का जन्मोत्सव शहर के बुद्धिजीवी लोगों ने मिलकर एक साथ मनाया। जिसमें ब्रांड एंबेसेडर, चिकित्सक, बाल कल्याण समिति के पदाधिकारी व अस्पताल में भर्ती मरीजों के बाकी परिजन शामिल हुए। सभी ने उत्साह के साथ नन्ही सी जान के जन्म-उत्सव की तरह मनाकर उसको नए कपड़े खरीदकर पहनाए।

पूरे अस्पताल परिसर में फल व मिठाइयां बांटकर उसके अपने होने का अहसास करवाया। अस्पताल से इसकी याद जुड़ी रही इसके लिए परिसर में पौधे लगावाए गए और पुस्तकें वितररित की गई। जी हां, शहर में पहली बार हुए इस आयोजन से सरकारी जनाना अस्पताल में जश्न का माहौल बना रहा। बाकी लोगों ने भी इस अनाथ को दुआएं देकर इसके उज्जवल भविष्य की कामना की। ब्रांड एंबेसेडर अभिलाषा रणवां की पहल पर इस जन्मोत्सव के दौरान एसके अस्पताल के पीएमओ डा. एसके शर्मा, बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष रतनलाल मिश्रा, सदस्य दुर्गा देवी रणवां, गिरवर सिंह, गजेंद्र सिंह, प्रकाश प्रजापत, राजकीय संप्रेषण व किशोर गृह की अधीक्षक डा. गार्गी शर्मा, डा. अशोक चौधरी सहित शहर के कई प्रमुख लोग इसके गवाह बने।


लिया संकल्प
नवजात बालिका को शनिवार की रात कोई जनाना अस्पताल के पालने में लावारिस छोड़ गया था। 2400 ग्राम की बच्ची पूरी तरह स्वस्थ होने के कारण उसे जयपुर शिशु गृह भिजवा दिया गया। हालांकि मासूम को जयपुर ले जाने के वक्त वहां मौजूद कई लोगों की आंखे भी भर आई थी कि एक अंजान लाडली उनसे दूर जा रही है। लेकिन, इस मौके पर उपस्थित लोगों ने इस बात का संकल्प भी लिया कि भविष्य में यदि कोई लावारिस बच्चा यहां आता है तो उसका जन्मोत्सव भी सब मिलकर इसी तरह मनाएंगे।


स्टाफ ने पिलाया दूध
दो दिन अस्पताल में रहने के दौरान मासूम की देखरेख में पूरा स्टाफ तन्मयता से जुटा रहा। कोई उसको दूध पिला रहा था तो किसी ने उसकी सुरक्षा की जिम्मेदारी बखूभी निभाई। सबने मिलकर लावारिस बच्ची को मानसी का नाम देकर जयपुर भिजवाया। उल्लेखनीय है कि पिछले पांच दिनों में इस अस्पताल के पालने में दो नवजात बच्चों को लावारिस छोड़ा जा चुका है। शहर में शिशु गृह नहीं होने के कारण लावारिस नवजात को जयपुर भिजवाया गया। स्टाफ को बताया कि यहां जगह कम होने के कारण बच्ची को लेने में समस्या आएगी।


सरकार करें सख्ती तो लगे रोक
छह दिन में नवजात मासूमों को पालना में छोडने की दूसरी घटना है। अपने कलेजे को पालना में रखकर खुद सकून महसूस करने वालों ने समाज में चिन्ता की लकीर खींच दी है। इस मामले में राजस्थान पत्रिका ने विभिन्न सामाजिक संगठनों की पदाधिकारियों से बातचीत की। महिलाओं का कहना है कि सरकार ने पालना की व्यवस्था तो शुरू कर दी। इसका मतलब यह नहीं है कि इस तरह का घिनोना कृत्य करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो। महिलाओं का कहना है कि सरकार को इस दिशा में कोई सख्त कानून बनाना चाहिए।


मानसिकता भी बदलें
एक तरफ समाज में कुछ लोग मासूम बच्चों के प्यार को तरसते है। दूसरी तरफ में कुछ इस तरह के उदाहरण सामने आते है। पालनाघर भी इसका स्थायी समाधान नहीं है। समाज को अपनी मानसिकता में बदलाव लाना होगा। वहीं ऐसे बच्चों को गोद देने की प्रक्रिया को भी काफी हद तक सरल करने की आवश्यकता है।


सबक सिखाना जरूरी
मासूम बच्चों के जीवन से खिलवाड़ का अधिकार किसी को नहीं है, चाहे वह उसके माता-पिता ही क्यो नहीं हो। सरकार को ऐसे लोगों को सबक जरूर सिखाना चाहिए। वहीं आमजन को ऐसे बच्चों के लिए सार्वजनिक आयोजन करने चाहिए, ताकि उनके जीवन में भी खुशियां जममगा सके।

रिश्ते होते कलंकित
इस तरह की घटनाओं से समाज में मां का रिश्ता कलंकित हो रहा है। मां अपने बच्चों को कलेजे का टुकड़ा मानकर उसके लिए सपने बुनती है। लेकिन यहां तो मां उसके सपनों की दुनिया शुरू होने से पहले ही साथ छोड़ रहे है। सरकार की अपनी जिम्मेदारी है, लेकिन समाज को भी अब सोचने की आवश्यकता है।

मानवीय मूल्यों में गिरावट
बहुत दुखद है। महज कुछ दिनों के अंतराल में यह दूसरी घटना है। नवजात को सीधे पालना में छोडना मानवीय मूल्यों के गिरते स्तर की कड़वी सच्चाई है। पाश्चात्य संस्कृति के कारण समाज का नैतिक पतन हुआ है। यह सच्चाई चिकित्सा एवं महिला एवं बाल विकास की दावों की हकीकत भी बयां करती है।


फिर कहां से आएगी बेटियां
एक तरफ समाज घटते लिंगानुपात को लेकर बेहद चिन्तित है। दूसरी तरफ इस तरह की घटनाएं लगातार सामने आ रही है। ***** जांच के नाम पर बेटियों की कोख में हत्या करने वालों पर सरकार ने काफी शिकंजा कसा है। लेकिन फिर भी बदलाव की काफी आवश्यकता है। इससे दूसरे बेटियों में भी हीन भावना आती है।


चलाए जागरुकता अभियान
अभी समाज में जागरुकता की काफी कमी है। कई बार लोग बेटियों को बोझ समझकर नहीं चाहते है। इसलिए बेटियों को पालना में छोडने के साथ फेंक देते है। अब सामाजिक संगठनों के साथ सरकार को लोगों में जागरुकता की अलख जगानी होगी। वहीं इस तरह का घिनोना कृत्य करने वालों के खिलाफ भी कार्रवाई करनी चाहिए।


नवजातों को नया जीवन
कुछ अपने अपनों को कचरे के ढ़ेर पर छोड जाते है। उनको जरा भी अपने किए पर शर्म नहीं आती। लेकिन पालना की सुविधा के कारण इन नवजातों को नया जीवन मिल जाता है। लेकिन सरकार को पालना गृह की संख्या और बढ़ाने के साथ ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई भी करनी चाहिए।

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