सीकर

Kargil Vijay Diwas : अब राजस्थान के इस करगिल शहीद की बेटियां लड़ रही हैं यह ‘जंग’

Kargil Vijay Diwas : https://www.patrika.com/rajasthan-news/

2 min read
Jul 26, 2018
sikar shaheed seetaram kumawat

पलसाना(सीकर). करगिल युद्ध 1999 में दुश्मन के साथ जंग में शहादत देने वाले राजस्थान के सीकर जिले के पलसाना के लाडले शहीद सीताराम कुमावत की बेटियां अपने हक के लिए सरकारी सिस्टम से जंग लड़ रही है।

करगिल शहीद सीताराम कुमावत के कोई बेटा नहीं है। उनके 21 वर्षीय प्रियंका और 20 वर्षीय नीतू दो बेटियां हैं। दोनों बेटियों की उम्र पिता के शहीद होने के समय बहुत कम थी। जैसे जैसे दोनों बड़ी हुई और अपने पिता की शहादत के बारे में ज्ञान हुआ तो दोनों बेटियों ने भी सेना में जाने की चाह बनाकर इसकी तैयारियां करने लगी।

सरकार की ओर से एक बेटी को नौकरी देने का वादा किए जाने के बाद भी सरकार की ओर से इसे पूरा नहीं किए जाने के बाद बेटियों के मन में सरकारी सिस्टम को लेकर निराशा पैदा हो गई। अब एक बेटी ने तो इंजीनियंरिंग में अपना कॅरियर बनाने का मन बना लिया है और दूसरी को सरकारी घोषणा के अनुसार नौकरी का इंतजार है।

तीन चौकियों पर जमा लिया था कब्जा
सीताराम कुमावत 13 जून 1999 को ऑपरेशन विजय के दौरान करगिल में तैनात थे। इस दौरान सीताराम की 18 ग्रेनेडियर की टुकड़ी ने द्रास सैक्टर में तीन अग्रिम चौकियों पर कब्जा जमाने के बाद आगे की मोर्चाबंदी करना शुरू कर दिया। इस दौरान दुश्मन की ओर से दागी गई मिसाइल लगने से सीताराम शहीद हो गए। 16 जून को कस्बे में उनके शहीद होने की सूचना पहुंची। अगले दिन तिरंगे में लिपटा शव कस्बे में पहुंचा तो सम्पूर्ण कस्बा शहीद सीताराम अमर रहे के जय घोष से गूंज उठा

शहीद का नाम कर दिया मर्ज
शहादत को सम्मान देने के लिए सरकार की ओर से गांव के उच्च प्राथमिक विद्यालय का नामकरण शहीद के नाम से किया गया था। लेकिन इसके बाद विद्यालय दूसरे विद्यालय में मर्ज हो गया और शहीद का नाम फिर से गुमनाम हो गया।


जब परिवार को इसका पता चला तो परिवार और गांव के लोगों ने वीरांगना के साथ विद्यालय के सामने धरने पर बैठकर प्रदर्शन किया। इसके बाद उच्च माध्यमिक विद्यालय का नाम दानदाता के साथ संयुक्त रूप से शहीद का नाम बोर्ड पर तो अंकित कर दिया गया।


इसके लिए वे सैनिक कल्याण सलाहकार समिति के अध्यक्ष प्रेम ङ्क्षसह बाजौर व जिला कलक्टर से मिल चुकी हैं, लेकिन वे भी केवल आश्वासन ही दे रहे हैं। रक्षा विभाग के रिकार्ड में आज भी शहीद का नाम कहीं पर दर्ज नहीं है। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड की ओर से जारी होने वाली अंक तालिकाओं में विद्यालय का नाम आज भी केवल भामाशाह कन्हैलालाल ताम्बी के नाम से ही आ रहा है।

ये भी पढ़ें

करगिल युद्ध में पैर गंवाने के बावजूद नहीं खोया हौसला, जीत की खुशी ने भर दिए युद्ध के जख्म
Published on:
26 Jul 2018 10:57 am
Also Read
View All