सिरोही

यह कैसी संवेदना! (टिप्पणी)

खून नहीं मिला तो बिना उपचार गर्भवती पत्नी को लाया घर, मृत शिशु का जन्म

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Oct 04, 2019
sirohi

सिरोही से अमरसिंह राव...
सिरोही.प्रदेशभर में छोटी से लेकर गंभीर बीमारी तक का उपचार निशुल्क है और महंगी से महंगी दवाएं तक फ्री में दी जा रही हैं लेकिन लगता है सिरोही में गरीबों को इससे वंचित किया जा रहा है। यदि ऐसा नहीं होता तो एक मां को कोख से जन्म लेने वाले लाल को सूरत देखने से पहले ही नहीं खोना पड़ता।
बादला के निकट एक कृषि कुएं पर कार्यरत आदिवासी युवक गर्भवती पत्नी को दो दिन पहले प्रसव के लिए शिवगंज के राजकीय अस्पताल लेकर आया। उसे उम्मीद थी कि यहां अच्छा और निशुल्क उपचार हो जाएगा लेकिन चिकित्साकर्मियों की संवेदनहीनता देखिए अस्पताल में उसका उपचार शुरू करने के बजाय प्राइवेट लेबोरेट्री में खून की जांच करवाने भेज दिया। सवाल यह कि जब कई तरह की जांच की व्यवस्था सरकारी अस्पताल में निशुल्क है तो क्या उसे निजी लेबोरेट्री में भेजना उचित है? यदि जांच के लिए मरीज को बाहर ही भेजना है तो निशुल्क जांच का दावा क्यों? इस मामले में संवेदना हर बार तार-तार होती दिखी। जब वह जांच करवाकर लौटा तो उसे खून की कमी बताते हुए बिना उपचार दिए सिरोही के जिला अस्पताल रैफर कर दिया। वह वहां से 35 किमी दूर सिरोही जिले के सबसे बड़े अस्पताल पहुंचा तो यहां भी दुर्भाग्य ने उसका पीछा नहीं छोड़ा। यहां भी चिकित्साकर्मियों ने उसे खून लाने के लिए बोला लेकिन यहां वो बेचारा गरीब खून का प्रबंध नहीं कर पाया। हारकर जैसे-तैसे जुगाड़ के पैसों से साधन कर पत्नी को लेकर वापस घर आ गया। यहां करीब 48 घंटे तक प्रसव वेदना से कराहते हुए प्रसूता ने बिना संसाधनों के मृत शिशु को जन्म दिया। प्रसूता तो सुरक्षित है लेकिन वह अपने लाल को नहीं देख पाई। इसके लिए वह बार-बार सरकारी तंत्र को कोस रही है।
सवाल यह कि जिले के सबसे बड़े अस्पताल में भी जरूरत के समय खून नहीं मिले तो इसे क्या कहा जाएगा? आए दिन बड़ी संख्या में लोग स्वैच्छिक रक्तदान करते हैं वह कहां जाता है? यदि ब्लड बैंक में ही जमा किया जाता है तो जरूरत के समय क्यों नहीं उसे किसी गरीब को उपलब्ध करवाया जाता? यदि करवाया जाता तो यहां एक मां को बिना उपचार के नहीं लौटना पड़ता? उसे जन्म देने से पहले अपने लाल को नहीं खोना पड़ता। आखिर उस मासूम की मौत के लिए कौन जिम्मेदार है? जब ब्लड बैंक में खून के बदले ही दूसरा खून दिया जाता है तो आए दिन शिविरों से आने वाला ब्लड किसे चढ़ाया जा रहा है? वह गरीब आदिवासी हो सकता है इस सारी व्यवस्था को नहीं समझता हो। वो नहीं जानता कि उसे खून का इंतजाम कैसे करना है? तब क्या अस्पताल प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं बनती है कि उसका सम्पर्क किसी रक्तदाता समूह से करवाया जाए?
सरकार और महकमे के जिम्मेदार लोगों को चाहिए कि वे सरकारी अस्पताल और ब्लड बैंक की नियमित मॉनिटरिंग करें। अच्छे कार्मिकों-चिकित्सकों को प्रोत्साहित करें। लापरवाह कार्मिकों को सख्त सजा मिले तभी सरकार का निशुल्क उपचार व जांच का दावा सार्थक हो पाएगा।
amar.singh@in.patrika.com

Published on:
04 Oct 2019 09:22 am
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