सोनभद्र

आदिवासी बाहुल्य जनपद में आज भी प्राकृतिक रंगो से खेली जाती है होली

दुरूह क्षेत्र के आदिवासी अपने हाथों से तैयार करते है रंग...  
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Updated: 1 Mar 2018, 4:36 PM IST
natural colors in holi 2018 of tribal area
आदिवासी बाहुल्य जनपद में आज भी प्राकृतिक रंगो से खेली जाती है होली

जितेंद्र गुप्ता

सोनभद्र. इस आधुनिक युग में भी लोग आज भी प्राकृतिक रंगों से ही होली खेलते हैं। होली के दिन एक से बढ़कर एक महंगी केमीकल युक्त रंग, गुलाल व अबीर का प्रयोग करते है। वहीं आदिवासी बाहुल्य जनपद के दुद्धी तहसील के सबसे दुरूह व पहाड़ी इलाका करहिया, बोधाडीह, औराडंडी, बगरवा आदि गांवों में आज भी प्राकृतिक फूलों के रंग से होली खेली जाती है। यहां के मूल निवासी चेरो, गोड, खरवार, परहियां जैसी आदिवासी जातियां पलास,(टेसु) फुलझडी,सेमल आदि के फूलों से बनायी रंगो से होली खेलते हैं। जो खुद अपने हॉथों से रंगों को तैयार करते हैं। इसके लिए एक सप्ताह पहले से ही फूलों को तोड़कर एकत्रित करना तथा रंग बनाने का कार्य शुरू कर दिया जाता है, ताकि होली के दिन तक रंग पर्याप्त मात्रा मे तैयार हो जाये।

करहिया के बयोबृद्ध नन्हकू चेरो ,सुखई चेरो,बिहारी आदि का कहना है कि हम लोग आज तक अपने हॉथों से प्राकृतिक फूलों के बनाये रंगो से ही होली खेलते आये हैं। जो आज भी अनवरत चल रहा है।हालांकि बढ़ते प्रदूषण तथा अंधा धुंध कटते जंगलो के कारण अब पर्याप्त मात्रा मे फूलों का मिलना बड़ी मुश्किल हो गया है फिर भी किसी तरह से अभी तक काम चलाया जा रहा है। वहीं बोधाडीह के मनबोध, दरगाही, लछुमन, सुखाडी आदि लोगों ने बताया कि प्राकृतिक फूलों से बनाया गया रंग तथा गुलाल काफ़ी टिकाऊ भी होता है।

जो एक बार रंग लग जाए तो उसकी पहचान पूरे साल भर तक रहता है और सबसे खास बात कि प्राकृतिक रंगो से कभी भी किसी को कोई नुकसान या चेहरे पर कोई दाग़ नहीँ पड़ता है। चारों तरफ़ से वन पहाड़ियों से घिरा कनहर नदी के पूर्वी छोर पर बसे इन आधा दर्जन दूरूह गॉवों के रहन सहन भी पुराने रीति रिवाज़ से है। शिक्षा तथा जागरुकता के अभाव मे आधुनिक युग से कोंसो दूर है। यहॉ पर विभिन्न प्रकार के त्योहारों को मनाने का तरीक़ा जहॉ अपना अलग है, वहीं शादी विवाह भी पुरानी रीति रिवाज़ से करने की परम्परा है।


इस तरह से तैयार की जाती है रंग

दुद्धी क्षेत्र के दुरूह इलाकों मे आदिवासी होली खेलने के लिए अपने हॉथो से रंगो को तैयार करते है। पहले पलास,सेमल तथा फुलझडी आदि की फूलों को तोड़कर इसके बाद अच्छी तरह से कुट कर फिर बड़े बर्तन में पानी के साथ काफ़ी देर तक उबाला जाता है।जब पानी गाढा हो जाता है तब कपड़े से छानकर रंग को सुरकत रख लेते है। उसी तरह से विभिन्न प्रकार के फूलों को सुखाकर शील पर खूब महिन पीसकर अबीर तैयार किया जाता है। करहिया ग्राम प्रधान राम किशुन ने बताया कि यह क्षेत्र शहर के धूम धड़ाम से दूर लोग अपने अलग अंदाज में त्यौहार मनाते है।परम्परागत छाप छोड़ती इनकी जीवन शैली में थोड़ी बिभिन्नता जरूर है परन्तु सिमित संसाधनो के बावजूद एकता का परिचय देते हैं।

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