खास खबर

कविता-अभागों का शिलालेख

कविता

less than 1 minute read
Aug 13, 2022
कविता-अभागों का शिलालेख

प्रतिभा शर्मा

कुछ मरवाकर बिलों में घुसे थे
कुछ मारकर,
जो शेष रह गए थे
वे जीते-जी मर गए थे

कुछ को भड़काकर भेजा गया
कुछ को उकसाकर
जो सचमुच मारे गए
वे गरीब की औलाद थे

संख्याएं दोनों तरफ बढ़ रही थी
विलाप के सुर समान थे
और सिसकियों के भी,
लहू का रंग समान था
और कफन का भी,
लाशों से एक जैसी बू उठ रही थी
और बस्तियों से भी,
इसके पिता ने उसके पिता को बिलखते देखा
उसके भाई ने इसके भाई को

दोनों तरफ के दुख समरंगी थे
कोई भी जीवन हरा नहीं था
और नहीं था कोई नारंगी भी,
आंखों से जो बह रहा था
उस पानी का भी कोई रंग नहीं था
पर उष्णता
पहले से कहीं अधिक
बढ़ गई थी अब आंसुओं में

उस धुएं का रंग जरूर काला था
जो बस्तियों के साथ-साथ
दिलों को भी सुलगा रहा था

बस तहजीब हो गई थी
रंगहीन और गंधहीन

जुडि़ए पत्रिका के 'परिवार' फेसबुक ग्रुप से। यहां न केवल आपकी समस्याओं का समाधान होगा, बल्कि यहां फैमिली से जुड़ी कई गतिविधियांं भी देखने-सुनने को मिलेंगी। यहां अपनी रचनाएं (कहानी, कविता, लघुकथा, बोधकथा, प्रेरक प्रसंग, व्यंग्य, ब्लॉग आदि भी) शेयर कर सकेंगे। इनमें चयनित पठनीय सामग्री को अखबार में प्रकाशित किया जाएगा। तो अभी जॉइन करें 'परिवार' का फेसबुक ग्रुप। join और Create Post में जाकर अपनी रचनाएं और सुझाव भेजें। patrika.com

Published on:
13 Aug 2022 05:12 pm
Also Read
View All