आधी आबादी की सोच को अखबार में उतारने के लिए राजस्थान पत्रिका की पहल संडे वुमन गेस्ट एडिटर के तहत आज की गेस्ट एडिटर आईपीएस प्रीति चंद्रा हैं। हालही आपको जयपुर आयुक्तालय में अतिरिक्त पुलिस आयुक्त यातायात एवं प्रशासन का कार्यभार मिला है। आप 2008 बैच की अधिकारी हैं। आपका मानना हैं कि महिलाएं जिस तरह से घर संभालती हैं, उसी तरह से उन्हें शहर की ट्रैफिक व्यवस्था को संभालने में भी हमारा सहयोग करना चाहिए। उन्हें अपने घर के बच्चों व बड़ों को ट्रैफिक सेंस सिखाना चाहिए। बच्चों को बचपन से ही यातायात नियमों की जानकारी देनी चाहिए, ताकि सड़क दुर्घटनाओं में कमी आएं और शहरों की यातायात व्यवस्था सुचारू हो सकें।
प्रीति चंद्रा, संडे गेस्ट एडिटर
जयपुर. मेरा जन्म सीकर के गांव कुदन में हुआ, माता-पिता ने हमेशा आगे बढ़ाया। जयपुर के महारानी कॉलेज से पढ़ी, फिर शिक्षा के क्षेत्र में आ गई। सरकारी लैक्चरर भी रही, लेकिन हमेशा से सिविल सेवा की चाह थी, पहले ही प्रयास में सफलता मिल गई। उसके बाद शुरू हुई यात्रा। इस दौरान विभिन्न जिलों में काम करने का मौका मिला, चुनौती यह रही कि आज भी 10 प्रतिशत लोग ऐसे हैं, जो महिला अधिकारियों को गंभीरता से नहीं लेते।
स्वयं अनुशासन ही सुधार सकता है ट्रैफिक
उभरते शहरों में ट्रैफिक व्यवस्था एक बहुत बड़ी चुनौती बन गई है। सरकारी संसाधन सीमित हैं और टैक्सी, डिलीवरी सहित अन्य टाइम बाउंड सर्विसेज तेजी से बढ़ रही हंै। व्हीकल बढऩे से पार्किंग का लोड बढ़ रहा है। पार्किंग के कारण सड़के सिकुड़ रही हैं और अव्यवस्थित थड़ी-थेलों ने पार्किंग स्पेस को खत्म कर दिया है। यातायात हर आम आदमी की सुविधा है, ऐसे में स्वयं का अनुशासन और ट्रैफिक सेंस बहुत जरूरी है। प्रत्येक व्यक्ति यदि वाहन चलाने या पार्किंग करते समय यातायात संबंधी जागरूकता रखेगा तो शहरों की सूरत जरूर बदलेगी। माता-पिता की भूमिका इसमें अहम है, यदि वे बच्चों से वाकई में प्यार करते हैं, तो 18 साल से पहले उन्हें व्हीकल चलाने को नही दें।
सही उम्र में मिले ट्रैफिक का ज्ञान, तभी होगा बदलाव
जयपुर. यातायात नियमों के लिए बचपन से ही बच्चों को सिखाया जाए तो बड़े होने के बाद उन्हें ट्रैफिक नियमों को समझाने की जरूरत नहीं पड़ती है। पहले जब लोगों के बीच यातायात अवेयरनेस के लिए जाते थे, तब इतनी अवेयरनेस नहीं थी, लेकिन अब लोगों को समझाने के बाद वे यातायात नियमों का पालन करने लगे हंै। जयपुर पुलिस की सब इंस्पेक्टर इंदिरा अहलावत ने ट्रैफिक पुलिस में रहकर लाखों बच्चों को यातायात नियमों के पालन करने का पाठ सिखाया। ट्रैफिक जागरूकता के लिए रैली निकाली। अवेयरनेस कार्यक्रम चलाए, नुक्कड़ नाटक और रैली निकालकर प्रचार प्रसार किया। इसका असर भी नजर आया। अब तक उत्तम, अति उत्तम, सर्वोत्तम और राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित हो चुकीं इंदिरा का कहना है कि दस साल तक सैकड़ों स्कूलों में जाकर लाखों बच्चों को ट्रैफिक के बारे में बताया। इंदिरा वर्तमान में निर्भया स्क्वॉड में हैं।
मोटर व्हीकल एक्ट की ट्रेनिंग दी
इंदिरा ने बताया, पुलिस कांस्टेबल से लेकर इंस्पेक्टर तक को मोटर व्हीकल एक्ट की जानकारी के साथ ही जाम को किस तरह हटाया जाए, वीवीआईपी मूवमेंट के दौरान यातायात का संचालन किस तरह किया जाए, इसके बारे में डिटेल में बताया। स्कूल कॉलेजों में अवेयरनेस कैंपेन चलाए। यातायात नियमों को लेकर उनकी जिम्मेदारी समझाई, ताकि वह अनुशासित रहें। ट्रैफिक के बारे में आम जनता को जागरूक करने के लिए प्रदर्शनियां भी लगवार्इं।
फिल्मी अंदाज में लोगों को दे रहे सड़क सुरक्षा की सीख
जयपुर. एक्टर, डायरेक्टर और प्रोड्यूसर राज मिर्जा आमजन का मनोरंजन करने के साथ ही समाज के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को भी समझते हैं। वे अपनी फिल्मों के जरिए रोड सेफ्टी और ट्रैफिक अवेयरनेस का संदेश देने का प्रयास कर रहे हंै। राज प्रदेश के ट्रैफिक विभाग के साथ मिलकर कई फिल्मों का निर्माण कर चुके हैं। पिछले कई सालों से थियेटर से जुड़े राज बताते हैं कि उन्होंने हू विल हेल्प नाम से एक शॉर्टमूवी का निर्माण किया था, इसके बाद सड़क सुरक्षा पर कई फिल्में बनाई।
स्कूलों में वर्कशॉप
इतना ही नहीं उनकी संस्था की ओर से समय-समय पर स्कूलों में भी वर्कशॉप और प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है। जिसमें स्कूली बच्चों को यातायात के नियमों की पालना करने के लिए समझाया जाता है। रोड सेफ्टी व सड़कदुर्घटना से जुड़े तथ्यों की जानकारी दी जाती है।
लोगों को माला पहनाकर समझाते हैं ट्रैफिक नियम
अलवर. समाज सेवा से जुड़े गिरीश गुप्ता पिछले कई सालों से लोगों को ट्रैफिक नियमों के प्रति अवेयर कर रहे हैं। ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करने वाले वाहन चालकों को वे गुलाब का फूल भेंट करते हैं या फिर माला पहनाते हैं। वे अपने क्लब के सदस्यों के साथ मिलकर प्रतिवर्ष वाहनों पर रिफ्लेक्टर लगाते हैं। उन्होंने पांच साल में एक हजार से ज्यादा रिफ्लेक्टर लगाए हैं। सड़क सुरक्षा को लेकर काफी काम कर रहे हैं।
कार पूलिंग एक बेहतर तरीका
गिरीश गुप्ता बताते हैं कि छोटे-छोटे शहरों में यातायात की बहुत अच्छी व्यवस्थाएं हैं। बड़े शहरों के मुकाबले यहां पर यातायात सुचारू करना आसान रहता है। बड़े शहरों में ट्रैफि क को कम करने का एक बहुत अच्छा उदाहरण कार पूलिंग हो सकता है। घर के आस-पास रहने वाले ऑफिस कर्मचारी एक ही कार में ऑफिस आ सकते हैं।