
वर्तमान जीवनशैली बहुत तनावग्रस्त और भागदौड़ भरी है। बेहतर खान-पान के अभाव और जीवनशैली जनित रोगों के चलते महिलाओं और पुरुषों दोनों में नि:संतानता की परेशानी सामने आ रही है। इसका एक विकल्प सरोगेट मां से संतान पाने का भी है। लेकिन क्या सरोगेट महिला के अधिकार सिर्फ बच्चे के जन्म तक ही हैं और उसके बाद उसके मां बनने से जुड़े सभी अधिकार समाप्त हो जाते हैं? इसी तथ्य को इंगित करते हुए हाल ही हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला दिया। कोर्ट के इस फैसले को एक नजीर के रूप में देखा जाना चाहिए।
सरोगेट माँ को है पूरा अधिकार
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि सरोगेट महिला को भी सीसीएस (अवकाश) नियम 1972 के अधिनियम 43 (1) के तहत मातृत्व अवकाश लेने का पूरा अधिकार है। न्यायालय ने आगे कहा कि ऐसा न करना सरोगेट महिला के 'मां' होने का अपमान होगा। कोर्ट ने कहा कि प्राकृतिक मां और सरोगेट मां के बीच अंतर नहीं किया जा सकता है।
यह है मामले की पृष्ठभूमि
कोर्ट में जस्टिस तरलोक सिंह चौहान और जस्टिस संदीप शर्मा की पीठ एक सरोगेट मां की याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। उक्त याचिका में सरोगेट मां बनी एक महिला के लिए भी मातृत्व अवकाश का लाभ पाने की मांग की गई थी।
माँ की परिभाषा में अंतर नहीं हो सकता
पीठ ने कहा कि, 'मातृत्व बच्चे के जन्म के साथ समाप्त नहीं होता है। अनुरोध के बाद मां बनी एक महिला को मातृत्व अवकाश देने से इनकार नहीं किया जा सकता। वह भी केवल इस आधार पर कि उसने सरोगेसी के माध्यम से गर्भ प्राप्त किया है।'
यह है पूरा मामला
हाइकोर्ट में याचिका दायर करने वाली महिला कुल्लू जिले में सरकारी स्कूल में संविदा पर कार्यरत शिक्षक है। सरोगेसी के माध्यम से उन्होंने 10 सितंबर, 2020 को एक बच्चे को जन्म दिया। जिसके बाद, स्कूल के प्रधानाचार्य से मातृत्व अवकाश के लिए आवेदन किया था।