श्री गंगानगर

पिछले दो सालों में जिले में सैकड़ों लोगों की मौत, दान में नेत्र मिले महज 129

-नेत्रदान दिवस : कागजों में सिमटा मरणोपरांत नेत्रदान
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eye donation day
पिछले दो सालों में जिले में सैकड़ों लोगों की मौत, दान में नेत्र मिले महज 129

श्रीगंगानगर.

रक्त की तरह आंख भी किसी फैक्ट्री में नहीं बनती, यदि ऐसा होता तो कोई अंधा नहीं रहता। अंधता को दूर करने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं के बलबूते पर नेत्रदान के लिए मुहिम अब तक चल रही है लेकिन इलाकेवासियों में अंधता निवारण पर अंध विश्वास और पुरानी पम्परा हावी है।


लाखों रुपए का बजट फूंकने के बावजूद जिले में छत्तीस सालों में रुढि़वादिता हावी है। हर साल जिले में सैकड़ों लोगों की मौत किसी न किसी कारण हो रही है, लेकिन मरणों उपरांत भी मृतक के नेत्र उत्सर्जित नहीं करवाए जाते। चिकित्सकों की मानें तो समाज में परम्परा है कि मृतक की आंखें निकालने से अगले जन्म में वह अंधा पैदा होगा।


इस परिपाटी को रोकने के लिए जिलेभर में जीते जी रक्तदान और मरणों उपरांत नेत्रदान नारे लिखकर जागरूकता की मुहिम विभिन्न संगठनों और क्लबों ने चलाई थी। नेत्रदान के प्रति संकल्प पत्र भी भरवाए गए, लेकिन लोगों की मानसिकता में बदलाव नहीं आया। यही वजह है कि नेत्रदान के आंकड़ों को अंगुलियों पर गिना जा सकता है।


इसलिए नहीं बढ़ा आंकड़ा
इलाके की वरिष्ठ चिकित्सक डा. कृष्णा गेदर का कहना है कि व्यक्ति तो नेत्रदान का संकल्प पत्र भरता है, लेकिन उसकी मौत के बाद परिजन संबंधित नेत्र दान बैंक को सूचना नहीं करते। यदि भी करते हैं तो नेत्र उत्सर्जित करने की समय अवधि बीत जाती है।
सबसे बड़ा कारण लोगों में यह पुरानी मान्यता या परम्परा या अंध विश्वास है कि मृतक की आंखें निकालने से मृतक अगले जन्म में अंधा पैदा होगा। हर साल जितने व्यक्तियों की मौत हो रही है, उसमें से पचास प्रतिशत भी नेत्र मिल जाएं तो पूरे देश में अंधता का दाग धुल सकता है।


मानव सेवा से आत्म संतुष्टि
सूरतगढ़ महावीर इंटरनेशनल ने वर्ष 2000 से वर्ष 2016 तक 219 मृतकों के नेत्रदान में सहयोग किया है। संगठन के स्वयंसेवी संजय बैद का कहना है कि वर्ष 2000 में उसके नानाजी की मौत हो गई तब उनकी आंखों को दान किया गया था, तब से मन में यह प्रण लिया। यह कारवां आगे बढ़ता गया। सूरतगढ़ क्षेत्र में नेत्र जांच कैम्पों के माध्यम से संकल्प पत्र भी भरवाए गए। इसका परिणाम भी सामने आया। छह घंटों में भीतर संबंधित आंखों का उत्सर्जित करना होता है, जिस व्यक्ति या अंधे को यह आंखें प्रत्यारोपित करनी हैं उसकी समय अवधि महज 72 घंटे रहती है। इस कारण यह काम चुनौतीपूर्ण का काम है। इलाके में सरकारी मेडिकल कॉलेज शुरू हो जाएं तो नेत्रदान के प्रति अधिक रूझान बढ़ेगा।


महज 67 को मिली रोशनी
चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार जिले में पिछले दो सालों में 67 व्यक्तियों को आंखों की रोशनी मिली है, जबकि कुल 129 नेत्रदान हुए थे। वित्तीय वर्ष 20117-18ं में जगदम्बा आई बैंक में 64 और गुरुसर मोडिया आई बैंक में छह कुल 70 मृतकों से आंखें दान में मिली थी। इसमें से 37 नेत्र अंधे लोगों में प्रत्यारोपित किए गए। इसी तरह वित्तीय वर्ष 2016-17 में जगदम्बा अंध बैंक में 48 और गुरुसर मोडिया आई बैंक में 11, कुल 59 आंखें दान में मिली जबकि 30 लोगों को ये नेत्र प्रत्यारोपित किए गए। शेष आंखों को किसी घायल या झुलसे व्यक्तियों में प्रत्यारेापित के लिए इस्तेमाल करने का दावा किया जा रहा है।

Published on:
10 Jun 2018 09:06 am
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