श्री गंगानगर

खास बच्चों की खामोश दुनिया… अनसुनी आवाज़े

श्रीगंगानगर.विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर हर साल जागरूकता की बातें होती हैं, लेकिन जिले में ऑटिज्म से जूझ रहे बच्चों की असली कहानी आंकड़ों से कहीं ज्यादा गहरी और चिंताजनक है। सरकारी रिकॉर्ड में महज 23 बच्चे दर्ज हैं, जबकि निजी स्कूलों में संख्या 100 के पार है। शहर की 6 वर्षीय बच्ची की मां […]

2 min read

श्रीगंगानगर.विश्व ऑटिज्म जागरूकता दिवस पर हर साल जागरूकता की बातें होती हैं, लेकिन जिले में ऑटिज्म से जूझ रहे बच्चों की असली कहानी आंकड़ों से कहीं ज्यादा गहरी और चिंताजनक है। सरकारी रिकॉर्ड में महज 23 बच्चे दर्ज हैं, जबकि निजी स्कूलों में संख्या 100 के पार है। शहर की 6 वर्षीय बच्ची की मां बताती हैं कि उन्हें तीन साल तक यह समझ ही नहीं आया कि उनकी बेटी को ऑटिज्म है। उन्हें लगा कि बेटी देर से बोलेगी, लेकिन स्कूल में दिक्कतें बढ़ीं तो जांच करवाई। अब बच्ची नियमित स्पीच और ऑक्यूपेशनल थैरेपी ले रही है और सुधार भी दिख रहा है, लेकिन हर महीने इलाज का खर्च परिवार पर भारी पड़ रहा है।इसी तरह वार्ड-13 निवासी राजेश का 5 वर्षीय बेटा भी तीन साल की उम्र में ऑटिज्म से ग्रसित पाया गया। राजेश कहते हैं कि लोग इसे शरारत समझते हैं, जबकि यह एक स्थिति है, बीमारी नहीं।

थैरेपी का खर्च परिजनों के लिए बड़ी चुनौती

ऑटिज्म पीडि़त बच्चों का इलाज और थेरेपी का खर्च परिजनों के लिए बड़ी चुनौती है। स्पीच थैरेपी, ऑक्यूपेशनल थैरेपी और बिहेवियर थैरेपी के लिए निजी सेंटरों पर निर्भरता अधिक है, जहां हर महीने हजारों रुपए खर्च होते हैं। जिले में सीमित थैरेपी सेंटर होने के कारण ग्रामीण परिवारों को शहर आना पड़ता है।

जागरूकता की कमी बड़ी वजह

सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता की कमी ऑटिज्म पीडि़त बच्चों की स्थिति को और जटिल बनाती है। कई लोग अब भी ऑटिज्म को बीमारी या परवरिश की कमी समझते हैं, जिससे परिवार मानसिक दबाव में रहता है और कई बार इस स्थिति को छुपाने की कोशिश करता है।

ऑटिज्म क्या है?

ऑटिज्म एक न्यूरो डवलपमेंटल डिसऑर्डर है। इसमें बच्चे के व्यवहार, संवाद और सामाजिक संपर्क पर असर पड़ता है। इसे च्च्स्पेक्ट्रमज्ज् इसलिए कहा जाता है, क्योंकि इसके लक्षण हल्के से लेकर गंभीर तक अलग-अलग स्तर पर हो सकते हैं।

मुख्य लक्षण

बोलने या भाषा समझने में देरी, आंखों में आंख डालकर बात न करना

अकेले रहना पसंद करना, एक ही काम को बार-बार दोहराना, बदलाव से परेशानी होना
ऑटिज्म क्यों होता है?
ऑटिज्म का कोई एक निश्चित कारण नहीं है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार ये कारण जिम्मेदार हो सकते हैं:

जेनेटिक कारण : परिवार में पहले से ऐसे केस होने पर जोखिम बढ़ सकता है।

गर्भावस्था के दौरान : मां को इंफेक्शन, पोषण की कमी, ज्यादा उम्र में गर्भधारण, गर्भावस्था या शुरुआती बचपन में मस्तिष्क के विकास में बदलाव।

टॉपिक एक्सपर्ट

समावेशी शिक्षा के तहत कोई भी विद्यालय ऑटिज्म विद्यार्थी को उसकी दिव्यांगता के कारण स्कूल में प्रवेश से मना नहीं कर सकता। इन विद्यार्थियों के लिए जिले भर में 9 रिसोर्स केन्द्र संचालित हैं, जहां स्पेशल ट्रेनर की सुविधा उपलब्ध है। असाधारण एकाग्रता और तार्किक सोच इन बच्चों के शिक्षण में विशेष मददगार साबित होती है।

भूपेश शर्मा,समन्वयक, जिला दिव्यांगता प्रकोष्ठ, श्रीगंगानगर

बिहेवियर थैरेपी शुरू कर दी जाए

ऑटिज्म कोई बीमारी नहीं, बल्कि न्यूरो डवलपमेंटल कंडीशन है, जिसकी समय पर पहचान और हस्तक्षेप से काफी सुधार संभव है। यदि 2 से 3 वर्ष की उम्र में ही लक्षणों पर ध्यान देकर स्पीच और बिहेवियर थैरेपी शुरू कर दी जाए तो बच्चे की क्षमताओं में उल्लेखनीय सुधार हो सकता है।

डॉ.संजय राठी, शिशु रोग विशेषज्ञ, जिला चिकित्सालय

Published on:
02 Apr 2026 12:38 pm
Also Read
View All

अगली खबर