गाय के गोबर से बने कल्चर व आर्गेनिक खेती को दे रहे बढावा
रायसिंहनगर. बॉर्डर पर खेती कर रहे किसान नवाचारों की तरफ बढ रहे है। कीटनाशी रसायनों के प्रयोग से जमीनों में सामने आ रहे साइड इफेक्टस से बचने के लिए काश्तकारों ने गाय के गोबर से तैयार कल्चर का उपयोग शुरु किया है वहीं खेती के आधुनिकतम तरीकों को अपना रहे है। धीरे धीरे व्यवसायिक खेती की तरफ बढ रहे काश्तकारों द्वारा नवाचारों की तरफ बढने से जमीनों के स्तर में भी सुधार हो रहा है। हालांकि लगातार बदल रही मौसमी दशाओं ने खेती को प्रभावित किया है।
लेकिन इस पर नियंत्रण पाने के लिए किसान कीटनाशी रसायनों से अपनी निर्भरता कम कर रहे है। विशेषकर सीमा क्षेत्र में काश्तकार इस तरह के प्रयोग ज्यादा कर रहे है। सोशल मीडिया पर शेयर कर रहे तरीके गाय व अन्य पशुओं के गोबर व कचरे से तैयार किए जा रहे विभिन्न तरह के कल्चरों को बनाने के तरीके भी किसान आपस में सोशल मीडिया के माध्यम से शेयर कर रहे है। किसानों के अनुसार कल्चर तैयार करना आसान होने के साथ साथ सरल सुलभ भी है।
अधिकांश किसान बड़ी संख्या में पशु रखते है तथा हर साल पशुओं का गोबर बेचते रहे है। लेकिन अब गायों के गोबर का अपने ही खेत में कल्चर बनाने में प्रयुक्त कर रहे है। अपना रहे कम पानी वाली फसलें श्रीगंगानगर व हनुमानगढ जिलों में सिंचाई सुविधाओं के बावजूद पानी की कमी को देखते हुए किसान कम पानी वाली फसलों के साथ ही एक बार बिजान के बाद लंबे समय तक उत्पादन देने वाली फसलों में रुचि दिखा रहे है। इनमें थाई एप्पल, सहंजना, मोरिंगा जैसी फसलें शामिल है।
परम्परागत खेती में भी गेहूं की आर्गेनिक खेती को भी बढावा दे रहे है। इस तरह कर रहे खेती में बदलाव केस नंबर एक चक ३५ एनपी निवासी महावीर कड़वासरा ने परम्परागत खेती की बजाय खेती की नवीनतम तकनीक को बढावा देने के लिए अपने खेत को नए तरीके से तैयार किया है। उन्होने रासायनिक कीटनाशकों को अपनाने की बजाय गाय के गोबर से बने कल्चर को अपनी खेती में अपनाने का प्रयास किया है। इसी दौरान एक प्रगतिशील काश्तकार के सम्पर्क में आए तो महावीर ने खेत में थाई एप्पल लगाने का मन बनाया।
अब खेत को इस तरह से तैयार कर रहे है कि तीन माह बाद थाई एप्पल की फसल बो सके। महावीर ने बताया कि नरमा कपास जैसी परम्परागत फसलों से आय के अनुपात में हो रहा खर्चा वहन नहीं हो पा रहा है। केस नंबर दो लखाहाकम निवासी रमेश कुमार भांभू ने आर्गेनिक खेती को अपनाया है। पूरे खेत में बोई गई गेहूं की फसल में रासायनिक कीटनाशकों को अपनाने की बजाय गाय के गोबर से बनी कल्चर को काम में लिया है। रमेश ने बताया कि इसके परिणाम भी मिले है।
एक बार कल्चर बनाना सीखने के बाद रमेश भांभू ने अपने खेत में ही कल्चर तैयार करना शुरु कर दिया। अब वे व्हाट्सअप व सोशल मीडिया के जरिए कल्चर बनाने के तरीके भी अपने पड़ौसी काश्तकारों के साथ बांट रहे है। केस नंबर तीन गांव २४ पीटीडी निवासी काश्तकार सुनीलकुमार ने अपने खेत की तस्वीर ही बदल दी। उसने अपने छोटे से खेत में सुनील ने करीब एक साल पहले बदलाव की दिशा में प्रयास शुरु किए। उसने अपने खेत में सहजना, मोरिंगा, थाई एप्पल, सेंच्यूरी तरबूज, ड्रेगन फ्रूट जैसी फसलों को अपनाया।
काश्तकार सुनील कुमार ने बताया कि मोरिंगा के आसपास की मिट्टी की जांच अनूपगढ मृदा परीक्षण प्रयोगशाला में जांच करवाई गई तो आर्गेनिक कॉर्बन ०.६५ तक पाया गया जबकि पूरे श्रीगंगानगर जिले की मिट्टी में यह मात्रा ०.१५ से ०.२५ प्रतिशत तक है। सुनील कुमार पूरे खेत में जीरो बजट फॉर्मिंग कर रहे है। सुनील अपने खेत में ही गाय के गोबर, गौमूत्र, गुड़ व बेसन से तैयार किया गया जीवामृत तैयार करते है। नवाचारों में दिखा रहे है किसान अपनी रूचि ईलाके के काश्तकार खेती में नवाचारों को बढावा दे रहे है।