
राजेन्द्र बागड़ी
देवली. आधुनिकता की होड़ में जहां अभिभावक अपने व्यापार व बिजनेस में उलझे हुए हैं।
वहीं कम उम्र के बच्चे दिन-रात टीवी से चिपककर कार्टून देखने की भयावह परेशानी में समाते जा रहे हैं।
नतीजतन 50 में से पांच बच्चों के महज 10 वर्ष की उम्र में ही नजर के चश्मे लगाने की नौबत आ रही है।
स्थिति यह है कि अधिकतर बच्चों के रोल मॉडल भी ये कम्प्यूटरीकृत कार्टून बन चुके हैं।
बच्चों के शौक व जिद के आगे अभिभावक नतमस्तक इसका खमियाजा बच्चों व अभिभावकों को उठाना पड़ रहा है।
छह गुना दूरी से देखें टीवी
नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. राजेश मालपानी ने बताया टीवी की साइज के अनुरूप बच्चों को छह गुना दूरी से टीवी देखना चाहिए।
इससे आंखों की मांसपेशियों की थकान व लेंस के एंगल बिगडऩे से राहत मिलती है।
टीवी दूर से व कम्प्यूटर स्क्रीन पास से काम करने के लिए बनाए गए हैं।
एन्ड्रॉयड फोन ने बढ़ाई समस्या
टीवी पर कार्टून सीरियल देखने के अलावा अभिभावकों के लिए उनके एन्ड्रॉयड व स्मार्ट फोन परेशानी खड़ी कर रहे हैं।
स्कूलों में प्रतिदिन टीचर को मिलने वाली अभिभावकों की शिकायतों में बच्चों की ओर से स्मार्ट फोन के अधिक इस्तेमाल की शिकायतें भी आ रही है।
अभिभावकों का कहना है कि उनके मोबाइल रखते ही बच्चे सोशल मीडिया, फेसबुक व गेम आदि चलाने लगते हैं।
कई बच्चे तो दिनभर ही इन स्मार्ट फोन से चिपके रहते है
। बार-बार मना करने पर इन बच्चों में तेजी के साथ उत्तेजना के लक्षण पनप रहे है। यहां तक कि फोन तोडऩे की घटनाएं भी हुई है।
कमजोर हो रही आंखें
शहर की विभिन्न कॉलोनियों के करीब पांच दर्जन अभिभावकों से पूछताछ में सामने आया कि लगभग हर दूसरे परिवार में बच्चों के कार्टून कार्यक्रम देखने की समस्या है।
अभिभावकों की अनुपस्थित में बच्चे टीवी से चिपककर कार्यक्रम देखते हैं। इससे बच्चों की आंखों पर विपरीत प्रभाव पड़ रहा है।
शहर की आधा दर्जन निजी स्कूलों से मिली जानकारी से पता चला कि नर्सरी से लेकर पांचवी तक के करीब 20 प्रतिशत बच्चों के वयस्कों केसमान चश्में इन्हीं कार्यक्रमों की वजह से लग रहे है।
वहीं इन कार्यक्रमों के चलते अभिभावकों के सामने उनके पोषणयुक्त भोजन की समस्या भी बन रही है।
बच्चे इन कार्यक्रमों की इतने डूब जाते है कि वे खाना पीना तक भूल रहे हैं।
अभिभावकों का कहना है
पूजा हाड़ा- एजेंसी निवासी पूजा हाड़ा, राजेश कुमार का कहना है कि उनका पुत्र वंश उनके फोन से चिपका रहता है।
इसकी शिकायत उन्होंने विद्यालय में भी की है।
विवेकानंद कॉलोनी निवासी- बृजेश कुमार का कहना है कि वे पुत्र के कार्टून देखने व स्मार्टफोन चलाने की लत से परेशान है।
ज्योति मार्केट निवासी- कुलदीप चौधरी ने बताया कि उनके परिवार में भी बच्चों के कार्टून देखने की समस्या है।
कार्टून के अलावा भी बच्चे अन्य कार्यक्रम से चिपके रहते है।
कार्टून सीरियल व स्मार्ट फोन के संचालन की समस्या कई परिवार की है। अभिभावक प्रेम से बच्चों को गाइड कर इनके दुष्प्ररिणाम बताएं।
इसके लिए अभिभावक मनोचिकित्सक व बच्चों के शिक्षकों की मदद भी ले सकते है।
डॉ. सुधीर माथुर, चिकित्सालय प्रभारी, देवली