agriculture news सरहद पार जोधपुर रेलमार्ग से पाकिस्तान पहुंचता था कानोड़ का पान, आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया के कारण बंद हुई खेती
उदयपुर/ कानोड़. agriculture news 'खई के पान बनारस वाला...खुल जाए बंद अकल का ताला...फिर तो ऐेसा करे कमाल...सीधी कर दे उल्टी चालÓ फिल्मी गीत की यह पंक्तियां भले ही देश में बनारसी पान की वाहवाही करती हो, लेकिन उदयपुर के कानोड़ का पान भी कम रसीला नहीं है। किसी कारण से देश में प्रसिद्धि बनाने में पिछड़े रहे इस पान की पाकिस्तान में एक जमाने में बेहद मांग थी। कानोड़ का पान पाकिस्तान की महफिल में 'चाचा मियांÓ के मुंह लाल किया करता था। एक जमाने में 30 से 35 पनवाडिय़ों के माध्यम से यहां का देसी पान रेलमार्ग के जरिए पाकिस्तान पहुंचता था। पाकिस्तान और भारत के बिगड़े हुए कूटनीतिक रिश्तों के साथ पान की खेती में आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपया की नीतियों के बीच स्थानीय पान के खेतीहरों ने पान की पैदावार लगभग समाप्त कर दी है। आलम यह है कि पानी की इस खेती से स्थानीय खेतीहरों का मोह पूरी तरह भंग हो गया है, जबकि देश के महाराष्ट्र, गुजरात, दिल्ली और तमिलनाडू में भी कानोड़ के पान की विशेष मांग हुआ करती थी। पान की इस खेती को बचाने के लिए राजनीतिक स्तर पर पहले भी कई वादे हुए थे। पहले वाले नगर पालिका चुनाव में बोर्ड बनने के बाद पान की व्यवस्था को फिर से सुधारने के दावे भी हुए थे, लेकिन सत्ता सुख के बाद बोर्ड के जिम्मेदारों ने इस वादे को भूला दिया।
नहीं आता वो देसी स्वाद
कानोड़ में बंद हुई पान की खेती के बाद उदयपुर के बाजार में देसी पान की पूर्ति के लिए कलकत्ता, मद्रास और मध्यप्रदेश से पान मंगाए जाते हैं, लेकिन बाहरी पत्तों के बेरूखे स्वाद यहां के लोगों को स्थानीय पान का मजा नहीं दे पाए। पुराने लोगों की मानें तो राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. मोहनलाल सुखाडिय़ा भी कानोड़ के पान के शौकिन थे। कर्नाटक का राज्यपाल रहते हुए सुखाडिय़ा के लिए कानोड़ से स्पेशल देसी पान बेंगलुरु जाया करता था। इसके लिए बकायदा डबोक एयरपोर्ट पर पान को रखवाया जाता था। समय के साथ व्यवस्थाएं भी बदलती गई और पान की जगह लोगों की जुबां पर गुटखे ने रंगत जमानी शुरू कर दी। इसके चलते भी पान का यह धंधा प्रभावित हुआ है।
लुप्त होने लगा कत्था
समय, काल और परिस्थितियां स्थानीय कत्थे पर भी ग्रहण लगाती गई। देसी पान पर देशी कत्था का रंग लोगों को आकर्षक सुगंध के साथ मोहित करता था, लेकिन कत्था पैदा करने वाले खोरिया वृक्ष की अंधाधुंध कटाई से स्थानीय कत्थे की पहचान भी खोती चली गई। दूसरी ओर पानी की ज्यादा खपत और खर्च के कारण पान का कारोबार मंदा होता चला गया।
इनकी जुबानी में जिंदा है दर्द
विरासत में मिली पान की खेती को कानोड़ में जिंदा बनाए हुए 85 वर्षीय भंवरलाल तंबोली आज भी पाकिस्तान पर भेजे जाने वाले पान का गुणगान करते नहीं थकते। किसी भी फसल को बोते और काटते समय उनके मुंह से पान का जिक्र हरदम होता है। वर्ष 2012 तक एक पनवाड़ी को उन्होंने बचाए रखा था, लेकिन पनवासड़ी बचाना उनके लिए मुश्किल हो गया। भंवर लाल आज भी उस जमाने की सुगंधित तम्बाकू दिखाते हुए कहते हंै कि उस पान के साथ जमाने की सुगंधित तंबाकू की याद आती है तो मन मचल जाता है। भंवरलाल की मानें तो पान की खेती करना बच्चे को पालने जैसा था। फसल को दही, खल व अदी की खाद देने के साथ समान वातावरण में रखना पड़ता है। अधिक सर्दी तथा अतिवृष्टि से पान को बचाने के लिए बांस, घास, सांगटियों से स्थायी बाड़ा तैयार करना पड़ता था। वहीं धार्मिक हितों को ध्यान में रखकर अधिष्ठात्री देवी नागरवेल माता की स्थापना करनी पड़ी थी। पनवाड़ी में जूते-चप्पल पहनकर जाना वर्जित होता था। शराबियों एवं मांसाहारियों को पनवाड़ी से कोसों दूर रखा जाता था।
नि:शुल्क था पूजा का पान
पनवाड़ी से जुड़े हुए पुराने लोगों की मानें तो उस जमाने में पूजा के पान के नाम पर कोई भी खेतीहर पैसे नहीं लेता था। चार दशक से बस स्टैण्ड पर पान की दुकान चलाने वाले गुलाबसिंह चौहान उर्फ गुलाब पान वाला की मानें तो उस समय पान का प्रचलन चरम पर था, लेकिन अब उस मुकाबले में पान की खपत नहीं के बराबर हो गई है। गुलाबसिंह बताते हैं कि पान महंगा होने के बावजूद उस जमाने में पूजा के पान के लिए कभी भी पैसे नहीं लिए जाते थे। जबरन पैसा देने वालों को पान भी नहीं दिया जाता था। अब तो पान की कीमत 15 से 20 रुपए तक हो गई है।
बेरोजगारी ने बढ़ाया पलायन
दम तोड़ती पान की खेती के बीच तंबोली समाज में बेरोजगारी बढ़ गई है। पुराने हुनर को छोड़कर नई पीढ़ी का रोजगार को लेकर पलायन बढ़ गया है। पनवाडिय़ों से जुड़े कई मालिकों ने तो शहर से हमेशा के लिए नाता भी तोड़ लिया है। पान की खेती को बचाने के लिए स्थानीय समाज ने सरकारों से कई बार मदद की गुहार लगाई, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। पनवाड़ी संचालकों की मानें तो बीमा कंपनियों की ओर से पान की खेती का बीमा नहीं किया गया। बैंकों की ओर से उन्हें ऋण नहीं दिए गए। इसके चलते विषम परिस्थितियों में पान की खेती हमेशा के लिए पतन के द्वार तक पहुंच गई। भंवरलाल कहते हैं कि वो पान बहुत याद आते हैं। पान बोने का बहुत मन करता है। जाते-जाते एक पौधा वह जरूर लगाएंगे।
हम निभाएंगे वादा
नगर पालिका चुनाव से पूर्व भी जनता सेना की ओर से पान की खेती फिर से शुरू कराने का आमजनता से वादा किया गया था, जो भी खेती करना चाहता है। हम उसके साथ हैं। पार्टी की ओर से ऐसे खेतीहरों की हर संभव मदद की जाएगी। agriculture news आर्थिक सहयोग के अलावा कृषि विवि से उत्तम खेती को लेकर हर संभव मदद दिलाने का प्रयास होगा।
रणधीरसिंह भींडर, पूर्व विधायक, वल्लभनगर