
युवराज पचौरी/लूणदा. कस्बे सहित आसपास के क्षेत्र में काला सोना के नाम से मशहूर अफीम की फसल इन दिनों परवान पर है। किसानों ने शुभ मुहूर्त में माताजी के पूजन के बाद अफीम की फसल पर चीरा लगाने व लुवाई (रस एकत्र करने) का कार्य शुरू कर दिया है। वहीं, कुछ किसानों के लुवाई के कार्य में देरी बनी हुई है। लूणदा सहित अमरपुरा जागीर, धाकडों का खेडा, संग्रामुरा, मालनवास आदि गांवों में करीब 300 से अधिक अफीम पट्टाधारी किसान अफीम की खेती करते है। यहां किसान अफीम की सुरक्षा के लिए सीसीटीवी कैमरे से निगरानी कर रहे है।
डोडा से ऐसे निकलता है काला सोना
अनुज्ञापत्र मिलने के बाद अमूमन 15 अक्टूबर से 15 नवम्बर तक इसकी बुवाई की जाती है। लेकिन इस बार कई जगह पर देरी से बुवाई की गई। वहीं कई जगह डोडा से दूध निकलना शुरू हो गया है। जनवरी के अंत व फरवरी माह की शुरुआत में यह फसल पूर्ण यौवन पर रहती है। सफेद फूलों के बाद डोडियों से पौधे लद जाते हैं। फरवरी के द्वितीय सप्ताह से लेकर मार्च के प्रथम व दूसरे सप्ताह तक इसमें चीरा लगाने का काम शुरू होता है। डोडे में लगे चीरे से जो दूध निकलता है, वहीं अफीम कहलाता है। बुवाई होने के बाद से चीरा लगने एवं तुलाई नहीं होने तक किसानों की कड़ी मेहनत होती है। डोडे के तैयार होने के बाद विशेष औजार से इनको चीरा लगाकर उससे निकलने वाले दूध को भी विशेष तरीके से एकत्रित किया जाता है। यही एकत्रित दूध काला सोना अफीम कहलाती है। जो कि एक निर्धारित मात्रा में एकत्र कर नारकोटिक्स विभाग को तुलवाई जाती है।
बहुमूल्य होती है अफीम फसल
अफीम वर्तमान समय में क्षेत्र के किसानों के लिए बहुमूल्य फसल है। जो कि इन्हें अच्छी आमदनी के साथ समाज में रूतबा भी दिलाती है। अफीम काश्तकार अफीम खेती को बच्चे की तरह पालकर बढ़ा करते है। जिस दिन फसल बोई जाती है और जब तक कटाई नहीं होती, उसकी पल-पल देखभाल करते हैं। यही नहीं इसकी निगरानी के लिए किसान खेतों में अपना कच्चा मकान तैयार कर उसमें सुरक्षा करते है। किसानों को इसकी ज्यादा सुरक्षा करनी पड़ती है। बता दें, दो वर्ष पूर्व इस इलाके में खेतों से रात में अज्ञात बदमाशों ने डोडा के चोरी होने का मामला सामने आया था।