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उदयपुर : जब कोई अपना नहीं होता… तब इनके कंधे बनते हैं ‘अंतिम सफर के साथी’

बैकुंठ धाम सेवा संस्थान पिछले आठ वर्षों में 515 लावारिस शवों का सम्मानपूर्वक अंतिम संस्कार कर मानवता की मिसाल पेश कर चुका है। कोरोना काल सहित हर परिस्थिति में संस्था की टीम उन लोगों का अंतिम संस्कार करती है, जिनके अंतिम सफर में कोई अपना साथ देने वाला नहीं होता।
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baikunth dham sewa samiti

बैकुंठ धाम सेवा संस्थान की टीम, जो सेवा कार्य में जुटी रहती है।

उदयपुर. बैकुंठ धाम सेवा संस्थान के लिए लावारिस शवों का अंतिम संस्कार सेवा का काम है। बिना भेदभाव टीम मौके पहुंच जाती है। क्षत-विक्षत हो या दुर्गंध से भरा शव, इनके लिए सबसे पहले इंसानियत होती है। यही वजह है कि पिछले आठ वर्षों में उदयपुर की यह टीम 515 ऐसे लोगों को विदाई दे चुकी है, जिनके अंतिम सफर में अपना कहने वाला कोई नहीं था।

यह सेवा यात्रा संस्थापक मांगीलाल सुथार के संकल्प से शुरू हुई। वर्ष 2011 में वार्ड पंच बनने के बाद सार्वजनिक जीवन में आए मांगीलाल को महसूस हुआ कि राजनीति से अधिक संतोष समाज सेवा में है। इसी दौरान उनकी मुलाकात समाजसेवी हीरालाल साहू से हुई, जो लावारिस शवों का अंतिम संस्कार कर रहे थे। उनके साथ जुड़ने के बाद उन्होंने इस कार्य को ही जीवन का उद्देश्य बना लिया और वर्ष 2018 में बैकुंठ धाम सेवा संस्थान की स्थापना की। परिवार, मित्रों और सहयोगियों की मदद से शुरू हुआ यह प्रयास आज मानवता की एक मिसाल बन चुका है।

अब तक यह किए ये काम

515 लावारिस शवों का अंतिम संस्कार अब तक

362 शवों का दाह संस्कार लकड़ियां जुटाकर किया

80 का दाह संस्कार गैस शवदाह गृह में किया

73 शवों को दफनाया गया है संस्था की ओर से

कोरोना में भी नहीं छोड़ी सेवा

कोरोना काल में जब संक्रमित शवों के पास जाने से लोग डर रहे थे, तब इसी टीम ने पीपीई किट पहनकर 90 अज्ञात शवों और 16 कोरोना संक्रमित सहित कुल 106 शवों का सुरक्षित एवं सम्मानजनक अंतिम संस्कार किया। उस दौर में यह केवल सेवा नहीं, बल्कि मानवता के प्रति साहस और समर्पण का उदाहरण था।

लाचार परिवारों ने मांगी मदद तो बढ़े आगे

संस्थान ने 46 ऐसे लोगों का भी अंतिम संस्कार कराया, जिनके परिजन ने स्वयं संस्था से मदद मांगी। वहीं 17 ऐसे शव भी थे, जिन्हें उनके परिवार ने स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। सात सजायाफ्ता कैदियों के शवों का भी अंतिम संस्कार किया गया। चार शवों की पहचान होने पर अस्थियां भी परिजन को सौंपी।

अस्थि विसर्जन का जिम्मा भी उठाया

संस्थान की सेवा केवल अंतिम संस्कार तक सीमित नहीं है। वर्ष 2022 में 248, वर्ष 2023 में 80 और सितंबर 2024 में 90 मृतकों की अस्थियों का वैदिक विधि-विधान के साथ हरिद्वार में गंगा नदी में विसर्जन कराया गया, ताकि जिनका कोई अपना नहीं था, उन्हें भी धार्मिक परंपराओं के अनुरूप अंतिम सम्मान मिल सके।

जिन्हें किसी ने नहीं छुआ, उन्हें संभाला

कई बार शव कई दिन पुराने और अत्यधिक दुर्गंधयुक्त अवस्था में मिलते हैं, लेकिन टीम का कोई सदस्य पीछे नहीं हटता। सूचना मिलते ही स्वयंसेवक किसी भी समय मौके पर पहुंच जाते हैं। इस सेवा में शंकर दयाल शर्मा अपनी एंबुलेंस से शवों को निःशुल्क अशोकनगर मोक्षधाम तक पहुंचाकर अहम सहयोग देते हैं।

रात-दिन जुटी रहती है टीम

संस्थान का ज्यादातर खर्च पदाधिकारी ही जुटाते हैं। इस अभियान में हीरालाल साहू, कन्हैयालाल जीनगर, ललित चौरड़िया, सुभद्र पाठक, प्रथमेश चौहान, भैरूलाल सुथार, गोपाल वैष्णव, दिनेश कुमावत, लक्ष्मण गमेती, गोटु मेघवाल, करण सुथार और नंदराज भारती सहित पूरी टीम दिन-रात जुटी रहती है।