
उदयपुर। गत पिछले सप्ताह हुए इस सदी के सबसे लम्बे चन्द्रग्रहण के वैज्ञानिक अध्ययन ने सदियों से चली आ रही धारणा काे मिथ्या साबित कर दिया गया कि चंद्रग्रहण देखना घातक हो सकता है या फिर उसकी किरणें नुकसान पहुंचाती है। वैज्ञानिकों ने अपने प्रेक्षण में पाया कि ग्रहण के दौरान सूर्य की विकिरणें जब पृथ्वी के वायुमंडल को पार कर चंद्रमा पर पहुंची, तब उनमें कमी देखी गई यानी उनसे नुकसान की संभावना नहीं दिखी।
बीएन विश्वविद्यालय में प्रो. एसएनए जाफरी, डॉ देवेन्द्र पारीक, डॉ तेजेन्द्र प्रताप सिंह चौहान, खुशवंत पालीवाल, कुशाग्र नाग, प्रांजल जोशी व जयवर्धने सिंह चौहान की टीम ने 28 जुलाई को चन्द्रग्रहण के दौरान विभिन्न प्रेक्षण लिए। इनके विश्लेषण में पाया कि चंद्रग्रहण के दौरान जब सूर्य की किरणें पृथ्वी के वायुमंडल को पार कर चंद्रमा पर पहुंची तो उन विकिरणों का कॉम्पटनीकरण (कमी आना) सर्वाधिक हुआ। प्रो. जाफरी ने बताया कि 1270 केईवी गामा विकिरण में 2 प्रतिशत की कमी पाई गई। एेसे में यह कहा जा सकता है कि चंद्रग्रहण को देखने, इस दौरान बाहर निकलने से नुकसान जैसी धारणाएं आधारहीन है। चंद्रग्रहण देखने से कोई नुकसान नहीं होता।
बादलों को प्रेक्षण पर असर नहीं
जाफरी के अनुसार चंद्रग्रहण के दिन बादल होने से राजस्थान में अधिकतर जगह यह नजारा नहीं देखा जा सका था। पूर्ण चंद्रग्रहण का समय 103 मिनट था। बादलों ने उनकी टीम के प्रेक्षणों को ज्यादा प्रभावित नहीं किया क्योंकि प्रेक्षणों में गामा विकिरण ओर कठोर एक्सरेज बादलों को पार करके संसूचक (सिंटीलेशन) तक पहुंच गई और सफलतापूर्वक अध्ययन कर लिया गया।