उदयपुर

मेवाड़ के जंगल हर साल आग की चपेट में, अकेले उदयपुर में करीब 1000 घटनाएं

उदयपुर. प्रदेश के वन क्षेत्रों में हर साल 3000 से अधिक आगजनी की घटनाएं सामने आती हैं। इनमें से करीब 1000 घटनाएं अकेले उदयपुर जिले में होती हैं। इनमें भी 300 घटनाएं 5 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में आग लगने की होती है। इन घटनाओं से हर साल हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होता है। […]

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Mar 11, 2026
बड़ी ​िस्थत पाड़वा की पहाड़ी पर आग बुझाता ग्रामीण।

उदयपुर. प्रदेश के वन क्षेत्रों में हर साल 3000 से अधिक आगजनी की घटनाएं सामने आती हैं। इनमें से करीब 1000 घटनाएं अकेले उदयपुर जिले में होती हैं। इनमें भी 300 घटनाएं 5 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में आग लगने की होती है। इन घटनाओं से हर साल हजारों हेक्टेयर वन क्षेत्र प्रभावित होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों में आग पर नियंत्रण के लिए फायर लाइन का काम अब बजट की कमी के कारण प्रभावित हो रहा है, जबकि आग बुझाने के लिए वन विभाग आज भी पारंपरिक साधनों पर ही निर्भर है।

जानकारों के अनुसार आगजनी की घटनाएं वन्यजीव अभयारण्य क्षेत्रों में अधिक होती हैं। यहां पशु चराई नहीं होने से घास नहीं कटती और यही सूखी घास आग को तेजी से बड़े क्षेत्र में फैला देती है। जिन इलाकों में पशु चराई होती है, वहां इस तरह की घटनाएं अपेक्षाकृत कम होती हैं।

रोकथाम के लिए फायर लाइन प्रभावी

वन विशेषज्ञों के अनुसार जंगलों को आग से बचाने के लिए फायर लाइन बनाना सबसे प्रभावी उपाय है। इसके तहत बड़े वन क्षेत्र को छोटे-छोटे हिस्सों में बांटकर उनके बीच लगभग 10 मीटर चौड़ी पट्टी में घास काट दी जाती है, ताकि आग एक हिस्से से दूसरे हिस्से में न फैल सके। एक हेक्टेयर क्षेत्र में फायर लाइन बनाने पर करीब 8000 रुपए खर्च आते हैं। 2753.39 हेक्टेयर वन क्षेत्र वाले उदयपुर जिले में हर साल इसके लिए करीब 2 करोड़ रुपए से अधिक की आवश्यकता होती है, लेकिन इसके मुकाबले बजट बहुत कम मिलता है। कई बार यह बजट भी समय पर नहीं मिलता।

सैटेलाइट से मिलती है तुरंत सूचना

वन विभाग के अनुसार जंगल में कहीं भी आग लगते ही सैटेलाइट के माध्यम से उसकी लोकेशन का संदेश अधिकारियों और कर्मचारियों के मोबाइल पर पहुंच जाता है। कर्मचारी तुरंत मौके पर पहुंचकर आग बुझाने का प्रयास करते हैं, लेकिन संसाधनों की कमी के कारण आग पर जल्दी काबू पाना मुश्किल हो जाता है। अधिकांश मामलों में वनकर्मी और ग्रामीण हरी पत्तियों, बांस की टहनियों और झाड़ की मदद से पारंपरिक तरीके से आग बुझाते हैं। साथ ही आसपास की घास काटकर आग के फैलाव को रोकने की कोशिश की जाती है।

इन कारणों से लगती है जंगल में आग

- मार्च में महुआ के फूल गिरने पर उन्हें एकत्रित करने के लिए पेड़ों के नीचे घास-पत्ते जलाए जाते हैं, जिससे कई बार आग फैल जाती है।

- शहद निकालने के दौरान धुआं करने के लिए आग लगाई जाती है।

- आदिवासी समुदाय में ‘मगरास्नान’ की परंपरा के तहत पहाड़ियों पर आग लगाने की घटनाएं होती हैं।

- जंगल से गुजरने वाले लोगों द्वारा धूम्रपान के बाद बीड़ी-सिगरेट फेंक देने से आग लग जाती है।

- बांस के झुरमुटों में आपसी रगड़ से भी आग लग जाती है।

- जंगल के पास आबादी क्षेत्रों में कचरा जलाने से भी आग लगती है।

एक्सपर्ट व्यू...

वन पथ विकसित किए जाए

मेवाड़़ का वन क्षेत्र शुष्क घास वाला है। पहाड़ियों पर घास और बांस अधिक होने से कई बार आपस में रगड़ से भी आग लग जाती है, जबकि कई घटनाएं मानवीय भूल से होती हैं। जंगलों को सुरक्षित रखने के लिए फायर लाइन बनाना और वन पथ विकसित करना जरूरी है, ताकि कर्मचारी समय पर घटनास्थल तक पहुंच सकें। इसके लिए सरकार को वन विभाग को अतिरिक्त बजट उपलब्ध कराना चाहिए।

- आईपीएस मथारू, सेवानिवृत्त मुख्य वन संरक्षक

साल में दो बार बनाई जाए फायर लाइन

मेवाड़ क्षेत्र में अधिकतर ‘ग्राउंडफायर’ लगती है, जिसमें घास और झाड़ियां जलती हैं। इसलिए समय पर और पर्याप्त संख्या में फायर लाइन बनाना जरूरी है। साल में कम से कम दो बार फायर लाइन बनाई जानी चाहिए। सरकार को इस दिशा में बजट बढ़ाकर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, तभी जंगलों को आग से प्रभावी ढंग से बचाया जा सकता है।

- राहुल भटनागर, सेवानिवृत्त आईएफएस

Updated on:
11 Mar 2026 09:44 pm
Published on:
11 Mar 2026 07:02 pm
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