उदयपुर. एक्स-रे कक्ष में कायदों के प्रति बरती जा रही कोताही उपचार कराने आने वाले मरीजों और गर्भवती महिलाओं की सेहत पर भारी पड़ रही है।
उदयपुर . संभाग के सबसे बड़े महाराणा भूपाल चिकित्सालय के एक्स-रे कक्ष में कायदों के प्रति बरती जा रही कोताही उपचार कराने आने वाले मरीजों और गर्भवती महिलाओं की सेहत पर भारी पड़ रही है। इतना ही नहीं, यहां सेवाएं देने वाले स्टाफ की सेहत भी खतरे की जद में है। दरअसल, चिकित्सालय में संचालित एक्स-रे कक्ष कायदों के अनुसार सुरक्षित नहीं है। इसके अलावा सेवारत स्टाफ या फिर डिप्लोमा कोर्स कर रहे रेडियोग्राफर विद्यार्थी भी इस ओर असावधानी बरत रहे हैं।
आम तौर पर दिखने वाले कायदों को लेकर विशेषज्ञों की ओर से बरती जा रही ढिलाई नई मुसीबत को न्योता देती दिख रही है। विशेषज्ञों की मानें तो मानव शरीर पर पडऩे वाली अनावश्यक एक्स-रे विकिरण मरीजों में कैंसर एवं चर्म रोग को आमंत्रण देती है। इसके अलावा एक्स-रे कक्ष के बाहर बैठने वाली गर्भवती महिलाओं के लिए एक्स-रे तब और खतरनाक हो जाता है, जब तैयार हो रहे भू्रण में समस्या से जन्मजात बीमारियां बन जाती हैं।
यह सावधानी जरूरी
- विकिरणों से तीमारदार को बचाने के लिए दीवारों और दरवाजों पर लेड शीट या लेड पेंट कराना चाहिए।
- शीट के अभाव में पेंट का समयानुसार दोहराना सुनिश्चित होना चाहिए।
- एक्स-रे कक्ष या फिर उससे सटी दीवारों वाली बैठक व्यवस्था से गर्भवती महिला को दूर रहना चाहिए।
- तीमारदारों और एक्स-रे के लिए कतार में लगे लोगों को भी स्वास्थ्य के प्रति सजग रहने की जरूरत है।
न टैग लगाते, ना लेड एप्रिन पहनते
नियमानुसार एक्स-रे कक्ष में सेवाएं देने वाले रेडियोग्राफर एवं विद्यार्थियों के लिए एक विशेष प्रकार का टैग दिया जाता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में टीएलडी (थर्मो ल्यूमेन्सिेंस डोपीमीटर) कहते हैं। ड्यूटी पर रहने वाला व्यक्ति उसकी ओर से लगाए गए इस टैग को कायदे से बार्क (भाभा एटोमी रिसर्च सेंटर) को प्रत्येक छह माह में भेजता है। इसके बाद संबंधित रिसर्च सेंटर कर्मचारी की ओर से ग्रहण की गई विकिरणों का खाका बनाकर रिपोर्ट बताता है कि उसने अब तक कितनी विकिरणों को ग्रहण कर लिया है।
ज्यादा विकिरण सेवन की स्थिति में बार्क संबंधित कर्मचारी को कुछ महीने कार्य नहीं करने की भी सलाह देता है। यह नियम सिटी स्केन, कैथलैब, मेमोग्राफी करने वाले कार्मिकों पर भी लागू होता है। पत्रिका की पड़ताल के अनुसार आधे से ज्यादा रेडियोग्राफर एवं विद्यार्थी इस टेग का प्रयोग नहीं करते। कई नए विद्यार्थियों को तो यह टेग भी जारी नहीं हुआ है। वहीं रेडियोग्राफर को रेडिएशन से बचाव के लिए लेड एप्रिन पहनने की अनिवार्यता है। जिसकी भी पालना नहीं हो रही।
एक्स-रे के कायदों की हो रही अनदेखी, जिम्मेदार नहीं दे रहे ध्यान
2000 एक्स-रे औसतन प्रतिदिन होते हैं एमबी हॉस्पिटल में
1000 एक्स-रे औसतन होते हैं जिला अस्पतालों में प्रतिदिन
08 एक्स-रे मशीनें वर्तमान में चल रही हैं एमबी अस्पताल में
05 रेडियोग्राफर होने चाहिए प्रति 150 बेड पर
15 नियमित रेडियोग्राफर कार्यरत हैं, स्वीकृत पद 60
इस तरह हो रही कायदों की अनदेखी
- एक्स-रे कक्ष के कायदे बताते हैं कि कक्ष की दीवारें करीब 9 इंची सीमेंट व कंक्रीट से निर्मित होनी चाहिए। लेकिन, चिकित्सालय के इमरजेंसी एवं ट्रोमा वार्ड में संचालित एक्स-रे कक्ष की दीवारें इस अनुपात में तैयार नहीं हुई हैं।
- अन्य जगहों पर संचालित एक्स-रे कक्ष की दीवारें रियासत काल की बनी हुई हैं। तत्कालीन समय में यह दीवारें कंक्रीट व सीमेंट से तैयार नहीं होकर चूना और रेत से निर्मित हैं।
-एक्स-रे कक्ष की खिड़कियों को मोटा करने के लिए ईंटों से चुना गया है। यह कायदा भी नियमों से परे होकर केवल दिखावटी ही है। ऐसे में कक्ष के बाहर बैठने वाले लोगों को भी यह विकिरणें सीधे प्रभवित नहीं कर अप्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित करती हैं।
-एक्स-रे कक्ष में विकिरण पॉइंट से एक मीटर की रेंज अधिक खतरनाक होती है, जबकि खुले दरवाजे वाले एक्स-रे कक्ष के बाहर खड़े लोग सेकण्डरी रेडियेशन की चपेट में आते हैं। यह विकिरणें पावरफूल नहीं होकर नुकसानदायक होती हैं।