
उदयपुर/ सलूम्बर. library जनजाति बाहुल्य सलूम्बर उपखण्ड में सार्वजनिक जिला पुस्तकालय स्थापित कर तत्कालीन प्रदेश की सरकार ने लोगों के बीच प्रशंसा तो बटोर ली, लेकिन इसके संचालन को लेकर बरती गई खामियों पर ध्यान नहीं दिया गया। बसावट की खामियों से सैकड़ों किताबों के संग्रहण वाले इस पुस्कालय में अपेक्षा के अनुपात में लोगों की आवक कम है। बांसवाड़ा-सलूम्बर मुख्य मार्ग पर स्थापित इस पुस्तकालय का खुद का कोई मुख्य द्वार नहीं है। विद्यालय परिसर में मैदान के एक छोर पर बनाए गए पुस्तकालय की मुख्य मार्ग से करीब दो सौ मीटर की दूरी के कारण यहां आम लोगों की पहुंच नहीं है। दूरदृष्टिता के अभाव में तैयार इस पुस्तकालय की स्थिति यह है कि ग्रामीणों को छोड़ों, नगर की आबादी भी इस पुस्तकालय की उपयोगिता को लेकर अनजान है। बता दें कि शिक्षा के क्षेत्र में साहित्य, इतिहास, भूगोल, भौगोलिकता, सामान्य ज्ञान और विज्ञान जैसी पुस्तकों के अलावा पत्र-पत्रिकाओं के प्रति स्थानीय लोगों को जागरूक करने की मंशा के साथ तत्कालीन सरकार ने यहां पर राजकीय सार्वजनिक जिला पुस्तकालय की नींव रखी थी, लेकिन तकनीकी खामी और प्रचार-प्रसार के अभाव में करीब 10 साल बाद भी अपेक्षा के अनुपात में यहां विद्यार्थियों और युवा वर्ग की उपस्थिति नहीं है। कहे तो लोगों के बीच सुविधा का उपयोग नहीं हो रहा।
75 लाख की लागत
स्थानीय लोगों और जनप्रतिनिधियों की मांग पर वर्ष 2007 में तत्कालीन प्रदेश सरकार ने भाषा एवं पुस्तकालय विभाग के माध्यम से इस पुस्तकालय की स्थापना की थी। इसका विधिवत संचालन वर्ष 2008 में शुरू हुआ। तत्कालीन जिला कलक्टर ने राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय परिसर में जिला कलक्टर की ओर से बिलानाम जमीन का पुस्तकालय के लिए आवंटन हुआ। इस कड़ी में वर्ष 2010-11 में राजाराम मोहनराय पुस्तकालय फाउंडेशन कलकत्ता की ओर से 25 लाख की राशि देकर पहला भवन निर्माण कराया गया। भवन व विस्तार के तहत वर्ष 2017-18 में भाषा एवं पुस्तकालय विभाग जयपुर की ओर से 50 लाख रुपए की राशि स्वीकृत कर विशाल पुस्तकालय भवन स्थापित किया गया।
ऐसी है तकनीकी खामी
सलूम्बर होकर गुजरते बांसवाड़ा-उदयपुर सड़क मार्ग पर स्थित राउमावि के मैदान परिसर की चार दीवारी के अंतिम छोर पर स्थापित पुस्तकालय भवन तक पहुंचने के लिए करीब 2 सौ मीटर की दूरी तय करनी होती है। ऐसे में आमजन यहां तक पहुंचने में कतराता है। आम नागरिक पुस्तकालय को विद्यालय का हिस्सा मानकर भीतर नहीं जाते। वहीं संपर्क सड़क पर पुस्तकालय का मुख्य दरवाजा बनाने पर यह दूरी महज 10 मीटर हो सकती है, लेकिन राजनीतिक महत्वाकंाक्षा के अभाव में अब तक पुस्तकालय का मुख्य दरवाजा नहीं बन सका। इसके अलावा सार्वजनिक जिला पुस्तकालय के नाम पर यहां कोई सूचना पट्ट भी नहीं लगा है। इसलिए भी लोग व्यवस्था से अनजान बने हैं।
कहते हैं हालात
पुस्तकालय संचालन के लिए यहां पुस्तकालय अध्यक्ष, लिपिक व चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी जैसे कई पद स्वीकृत हैं, लेकिन 15 माह से अध्यक्ष और करीब 4 साल से लिपिक जैसे पद रिक्त हैं। वर्तमान में सेवानिवृत्त पुस्तकालय अध्यक्ष एवं संविदा कार्मिक के भरोसे इसका संचालन हो रहा है।
पूरी है तैयारी
संपर्क सड़क से चार दीवारी का मुख्य दरवाजा बनकर तैयार है। विद्यालय की ओर से पूर्व चार दीवारी निर्माण किया हुआ है। इसके चलते आमजन के लिए मुख्य दरवाजा नहीं खोला जा सका है। इसलिए ही साइन बोर्ड भी नहीं लगा सके हैं।
धीरजमल जैन, पुस्तकालय अध्यक्ष (संविदा पर)
विद्यालय की जमीन
पुस्तकालय के आगे की जमीन और चार दीवारी विद्यालय के खाते में है। अगर, उनका साइन बोर्ड लगाना है तो परिसर में दूसरा दरवाजा लगा दें।
के.के. पानेरी, प्रधानाचार्य, राउमावि सलूम्बर
इनके अनजाने बोल....
मंडल पुस्तकालय तक
सार्वजनिक पुस्तकालय होने की हमें जानकारी नहीं है। ऐसे में उदयपुर मंडल पुस्तकालय की ओर रूख करना पड़ता है।
श्याम प्रकाश, नगरवासी, सलूम्बर
किराए की मजबूरी
प्रमुख पुस्तकें अक्सर बाजार में नहीं मिलती हैं। ऐसे में अध्ययन के लिए पुस्तकालय की मदद लेनी पड़ती है। स्थानीय स्तर पर जिला स्तरीय पुस्तकालय के अभाव में उदयपुर जैसी जगहों पर किराए का मकान लेकर रहना पड़ता है। library ताकि नियमित तौर पर पुस्तकालय का उपयोग कर सकें।
पूनम नागौरी, छात्रा, राजकीय महाविद्यालय