
उदयपुर . मेवाड़ शैली में पीढि़यों से हो रहे लघुचित्रण (मिनिएचर आर्ट) के प्रति देश-दुनिया के कलाप्रेमियों का लगाव किसी से छिपा नहीं है। बहरहाल, आज चर्चा उस पारम्परिक कला के अलावा नाम कमा रहे एक एेसे कलाकार की, जिसने बचपन में फर्श-दीवारों पर कोयले और चॉक से कला भावों को उकेरा और बाद में स्कूल-कॉलेज में इस विषय की डिग्रियां हासिल कर न केवल रोजगार हासिल किया अपितु अब तक अनेक प्रारूपों से जुडक़र सेवाएं दे रहे हैं।
शहर में मिनिएचर और कंटम्प्रेरी से लेकर मॉडर्न आर्ट, डिजिटल आर्ट, एब्स्टे्रक्ट आर्ट, इलस्ट्रेशन और कोलाज जैसी अनेक विधाओं के वरिष्ठ और युवा कलाकारों की एक लंबी फेहरिस्त है। उनमें कंटम्प्रेरी (समसामयिक चित्रण कला) आर्टिस्ट सूची के अनेक कलाकारों में राजाराम व्यास का नाम भी शुमार है। बचपन से ही अपने स्कूली मित्रों और परिवार में सगे-संबंधियों को अपने हाथ के हुनर से प्रभावित करने वाले राजाराम ने वर्ष 1979 में उदयपुर विश्वविद्यालय (अब सुविवि) से ड्राइंग एंड पेंटिंग में एमए करके चार वर्ष निजी स्कूल में बतौर कला शिक्षक सेवाएं दीं।
पहली सरकारी पोस्टिंग वर्ष 1973 में
देवगढ़ मदारिया में हुईं जहां उन्होंने ९ साल और फिर अगले 2 साल ऋषभदेव कला व्याख्याता पद पर कार्य किया। इसके बाद में टीचर्स ट्रेनिंग प्रोग्राम से जुड़े रहकर कला शिक्षक प्रकोष्ठ इंचार्ज बने। इस बीच पीपलीनगर (कामलीघाट) और सलूम्बर क्षेत्रों में कला सेवाएं दीं।
बरसों टखमण जैसी संस्था से संबद्ध
राजाराम वर्तमान में एसआईईआरटी में सिद्धहस्त कलाकारों और कला शिक्षकों से समन्वय स्थापित कर उदयपुर के अलावा मोलेला, माउण्ट आबू जैसी जगह पर कार्यशालाएं आयोजित कर रहे हैं। इसके अलावा पश्चिम क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र और सीसीआरटी के साथ कला वार्ताओं के माध्यम से सृजनकारों को लाभान्वित कर रहे हैं। वर्तमान में स्कूल-कॉलेजों में कला शिक्षा का स्तर बढ़ाने के लिए सरकारी तौर पर कोई कारगर योजना नहीं है। यह दु:ख का विषय है। इससे कला और कला जगत दोनों का भला नहीं हो पा रहा है। स्कूली शिक्षा में कला विशेषज्ञ शिक्षकों की नियुक्ति के अलावा अध्यापकों, अधिकारियों व अभिभावकों के बीच सीधे संवाद और तकनीकी ज्ञान के आदान-प्रदान से स्थिति में सुधार अपेक्षित हो सकता है।