
भुवनेश पण्ड्या
उदयपुर. बाल चिकित्सालय की नर्सरी में भर्ती बच्चे कुछ माह पूर्व तक बड़ों की तरह ही खुले स्ट्रेचर में बाहरी जांचों के लिए भेजे जाते थे जिन्हें देखकर नर्सेजकर्मी उमेश को लगता कि वे सुरक्षित नहीं हैं। उसने महसूस किया कि ये कभी लुढ़क गए तो जान पर आफत आ सकती है। आखिर नन्हा तो नन्हा ही है, फूल सा कोमल। कुछ दिनों तक तो वह यह देखता रहा, जो उसके मन में कचोटता रहा था। आखिरकार उसने एेसी कांच की ट्रॉली इजाद कर दी, जो दृढ इच्छाशक्ति की बड़ी मिसाल है।
उमेश चौबीसा ने सोचा कि एनआईसीयू की नर्सरी में भर्ती जिन बच्चों को इको-कार्डियोग्राम या सोनोग्राफी के लिए बाहर भेजा जाता था, उनके लिए यहां इन्क्यूबेटर मशीन तो उपलब्ध नहीं है जिसकी कीमत करीब १२ लाख रुपए है। मगर उस जैसी मशीन तो बनाई ही जा सकती है। उसने कुछ राशि चिकित्सकों से जुटाई तो शेष खुद की जेब से। बाद में उसने स्टील और कांच से इस ट्रॅाली को बनवा दिया। अब ये बच्चों को लाने-ले जाने के काम में ली जाती है। ट्रॉली को स्टील फ्रेम कर फाइबर लगवा कर तैयार किया गया, ताकि बच्चों को पूरा आराम मिले।
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इसलिए मनाते हैं यह दिन
नोबल नर्सिंग सेवा की शुरुआत करने वाली फ्लोरेंस नाइटइंगेल के जन्म दिवस पर हर वर्ष दुनिया भर में अंतरराष्ट्रीय नर्सिंग दिवस मनाया जाता है। 12 मई 1965 को इसकी शुरुआत हुर्द। नर्सिंग की सराहनीय सेवा को मान्यता प्रदान करने के लिए परिवार एवं कल्याण मंत्रालय ने राष्ट्रीय फ्लोरेंस नाइटइंगेल पुरस्कार की शुरुआत की। यह पुरस्कार प्रति राष्ट्रपति प्रदान करते हैं।