
उदयपुर. किसी के लिए सांप, मगरमच्छ या अजगर सिर्फ खतरनाक जीव है, पर उदयपुर के तीन वन्यजीव प्रेमियों के लिए ये भी प्रकृति की अनमोल धरोहर है। पिछले तीन दशकों से ये बिना किसी स्वार्थ और समय की परवाह किए हजारों वन्यजीवों का रेस्क्यू कर उन्हें नया जीवन दे रहे हैं। इनकी मुहिम ने न केवल हजारों जीवों की जान बचाई, बल्कि समाज में फैले अंधविश्वास को भी चुनौती दी। आज इनके प्रयासों से मेवाड़ ही नहीं, पूरे राजस्थान में वन्यजीव संरक्षण की नई चेतना विकसित हुई है।
चमनसिंह चौहान: एक घायल कोबरा ने बदल दी जिंदगी की दिशा
महज दस वर्ष की उम्र में सड़क पर घायल जानवरों को उठाकर पशु चिकित्सालय पहुंचाने वाला बालक आज प्रदेश के सबसे चर्चित वन्यजीव रेस्क्यूर्स में शामिल है। डॉ. चमनसिंह चौहान 28 साल में 50 हजार से अधिक पशु-पक्षियों और वन्यजीवों का रेस्क्यू कर चुके हैं। 2005 में घायल कोबरा को लोगों के मारने की घटना ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया। इसके बाद गुजरात जाकर स्नेक रेस्क्यू का प्रशिक्षण लिया और उदयपुर में अभियान की शुरुआत की। धीरे-धीरे यह मुहिम पूरे राजस्थान तक पहुंची। उन्होंने हजारों महिलाओं और युवाओं को भी स्नेक रेस्क्यू का प्रशिक्षण दिया। उनके प्रयासों से बायोलॉजिकल पार्क में वाइल्ड डिस्पेंसरी और वर्षों की मेहनत के बाद सर्पेंटोरियम की स्थापना हुई। परिंडा अभियान, सेमल वृक्ष बचाने की पहल और वन्यजीव संरक्षण के कई जन आंदोलनों के जरिए उन्होंने साबित किया कि सेवा का संकल्प समाज में बड़ा बदलाव ला सकता है।
संदेश
कहते हैं कि कोई भी वन्यजीव उपचार के अभाव में दम न तोड़े। प्रकृति पर हर जीव का अधिकार है, उसे सुरक्षित वातावरण देना हम सभी की जिम्मेदारी है।
राजेन्द्र श्रीमाली: आधी रात का कॉल हो या कोई भी परिस्थिति, रुके नहीं
राजेन्द्र श्रीमाली के लिए हर रेस्क्यू कॉल किसी जीव का जीवन बचाने का अवसर होती है। दो दशक से 24 घंटे नि:शुल्क वन्यजीव बचाव अभियान चला रहे हैं। अब तक वे 10 हजार से अधिक सांप, मगरमच्छ, अजगर, मॉनिटर लिजर्ड, बंदर, उल्लू, बिज्जू और अन्य वन्यजीवों का रेस्क्यू कर प्राकृतिक आवास में छोड़ चुके हैं। वे इंसान और वन्यजीव के बीच बढ़ते संघर्ष को कम करने के लिए लगातार जागरूकता अभियान भी चलाते हैं। रात के 12 बजे भी सूचना मिलते ही वे बिना किसी हिचक मौके पर पहुंच जाते हैं। कई बार जहरीले सांपों को मारने के बजाय लोगों ने उन्हें सुरक्षित रेस्क्यू के लिए बुलाया, जिससे वन्यजीव संरक्षण के प्रति समाज का नजरिया बदला है। श्रीमाली ने वर्ष 2006 में 14 फीट लंबे अजगर को सुरक्षित सज्जनगढ़ बायोलॉजिकल पार्क पहुंचाया। दो माह से कुएं में फंसे मगरमच्छ को निकालकर बाघदड़ा नेचर पार्क छोड़ा, जबकि दुर्लभ रसेल वाइपर और विशाल कोबरा जैसे सापों का भी रेस्क्यू किया।
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कहते हैं कि पर्यावरण का संतुलन तभी संभव है, जब हर वन्यजीव सुरक्षित रहेगा। यही सोच उन्हें हर दिन और हर रात सेवा के लिए प्रेरित करती है।
पदमसिंहराठौड़: लोगों को सांप मारते देखा तो विचलित होकर शुरू कर दी सेवा
पदम सिंह राठौड़ पिछले कई वर्षों से घायल और बीमार वन्यजीवों के उपचार के साथ ही स्नेक रेस्क्यू अभियान में सक्रिय हैं। पिछले 30 साल में वे 70 हजार से ज्यादा सांप, मगरमच्छ, अजगर और अन्य वन्यजीवों का सुरक्षित उपचार और रेस्क्यू कर उन्हें दोबारा प्राकृतिक आवास में पहुंचा चुके हैं। राठौड़ बताते हैं कि अधिकांश लोग सांप दिखते ही उसे मारने की कोशिश करते हैं, जबकि ज्यादातर प्रजातियां मानव पर तब तक हमला नहीं करतीं, जब तक उन्हें खतरा महसूस न हो। इसी सोच को बदलने के लिए वे स्कूलों, कॉलेजों और सामाजिक कार्यक्रमों में लगातार जागरूकता अभियान चलाते हैं। उनका मानना है कि वन्यजीव संरक्षण सिर्फ वन विभाग की जिम्मेदारी नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। रेस्क्यू के दौरान कई बार उन्हें अत्यंत विषैले कोबरा, रसेल वाइपर और करैत जैसे सांपों का सामना करना पड़ा, लेकिन प्रशिक्षण, धैर्य और वैज्ञानिक तरीके से काम करने के कारण हर अभियान सफल रहा।
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कहते हैं कि किसी भी वन्यजीव को बचाना केवल एक जीव का जीवन बचाना नहीं, बल्कि प्रकृति के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा करना है।