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उदयपुर : कागजों में फंसा शहर, बिना पट्टों के जी रहे हजारों परिवार

उदयपुर की दर्जनों कॉलोनियों में हजारों परिवार वर्षों से बिना पट्टों और मूलभूत सुविधाओं के रह रहे हैं, जबकि नियमन की फाइलें तकनीकी और कानूनी अड़चनों में अटकी हैं।
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tulsi nagar debari

तुलसीनगर देबारी 

उदयपुर. शहर के विस्तार के साथ पिछले तीन-चार दशक में सैकड़ों कॉलोनियां बस गईं। लोगों ने जीवनभर की जमा-पूंजी लगाकर मकान बनाए, परिवार बसाए, बिजली-पानी के अस्थायी इंतजाम किए और इस उम्मीद में रहे कि एक दिन सरकार कॉलोनियों का नियमन करेगी और पट्टे मिल जाएंगे। पर आज शहर और पेराफेरी की दर्जनों कॉलोनियों में हजारों परिवार ऐसे हैं, जिनके आलीशान मकानों के बाहर आज भी सड़क, नाली, स्ट्रीट लाइट जैसी सुविधाएं नहीं है और न नगर निकाय की कचरा उठाने जैसी नियमित सुविधाएं। कारण एक ही है कहीं कृषि भूमि का विवाद, कहीं मास्टर प्लान की बाधा, कहीं जलभराव क्षेत्र, कहीं ग्रीन जोन तो कहीं इको सेंसेटिव जोन का पेंच। बड़ा सवाल यह है कि यदि इन क्षेत्रों में निर्माण नियमों के विपरीत था तो वर्षों तक निर्माण कैसे होता रहा? जब कॉलोनियां बस रही थी, प्लॉट बिक रहे थे और हजारों मकान बन रहे थे, तब जिम्मेदार विभागों ने न तो निर्माण रोके, न लोगों को आगाह किया और न ही नियमों का पालन कराया। अब जब लोग नियमन और पट्टे के लिए आवेदन कर रहे हैं तो उन्हीं नियमों का हवाला देकर फाइलें रोकी जा रही है।

कहीं कृषि भूमि तो कहीं जलभराव, हर कॉलोनी की अलग अड़चन

शहर के लगभग हर हिस्से में ऐसी कॉलोनियां हैं, जहां किसी न किसी तकनीकी कारण से नियमन की फाइल आगे नहीं बढ़ पा रही। वर्षों से बसे परिवार सरकारी शिविरों में उम्मीद लेकर पहुंचे, लेकिन राहत के बजाय नई आपत्तियां सामने आ गईं।

केस-1 : वैशाली नगर, देबारी

1984 से कृषि भूमि पर बसी इस कॉलोनी में करीब 372 मकान बन चुके हैं। चार दशक बाद भी कॉलोनी का नियमन नहीं हो सका। न सड़क बनी, न नालियां और न ही स्ट्रीट लाइट की व्यवस्था हो पाई। कॉलोनीवासियों ने कई बार नियमन के लिए आवेदन किए, लेकिन आज तक पट्टे नहीं मिले।

केस-2 : तुलसीनगर, भुवाणा

1992 से आबाद इस कॉलोनी में सैकड़ों परिवार रह रहे हैं। इसके बावजूद कॉलोनी का नियमन नहीं हुआ। मूलभूत सुविधाओं का अभाव आज भी बना हुआ है। भुवाणा के ही वर्धमान नगर की स्थिति भी ऐसी ही है। दो दशक से अधिक समय में आबादी बस गई, लेकिन सड़क, नाली और अन्य सुविधाएं आज भी सपना बनी हुई हैं।

केस-3 : रूपसागर क्षेत्र

रूपसागर के आसपास लवली स्टेट, नाकोड़ा नगर, पंजाबी बाग, न्यू अरिहंत नगर, अरिहंत नगर और सागर कॉम्प्लेक्स जैसी कॉलोनियां वर्षों पहले बस चुकी हैं। बाद में इन्हें जलभराव क्षेत्र मानते हुए नियमन और पट्टों पर रोक लगा दी गई। नतीजा यह है कि कई कॉलोनियों में आज भी सड़क और नालियों जैसी मूलभूत सुविधाएं विकसित नहीं हो सकीं।

जब रोक लगानी थी तब चुप रहे, अब नियमों का दे रहे हवाला

विशेषज्ञों और कॉलोनीवासियों का सबसे बड़ा सवाल है कि यदि ये क्षेत्र कृषि भूमि, जलभराव क्षेत्र, ग्रीन जोन, इको सेंसिटिव जोन या मास्टर प्लान के विपरीत थे, तो निर्माण के समय कार्रवाई क्यों नहीं हुई? अब भूमिदलालों की कारस्तानियों के साथ ही यूडीए व निगम की लापरवाहियां खुलकर सामने आ रही है।

ऐसी लापरवाही

- कृषि भूमि पर कॉलोनियां बसती रही, किसी ने नहीं रोका।

- मास्टर प्लान लागू होने के बाद भी वर्षों तक उसका पालन नहीं कराया गया।

- ग्रीन जोन में प्लॉट बिकते रहे और मकान बनते रहे।

- जलभराव क्षेत्रों में कॉलोनियां विकसित हो गई।

- इको सेंसिटिव क्षेत्र में निर्माण होता रहा, बाद में रोक लगा दी गई।

- कई जगह सड़क की आरक्षित भूमि तक पर मकान बन गए और प्रशासन देखता रहा।

कई फैसले केवल कागजी रिकॉर्ड के आधार पर, हकीकत अलग

शहर और पेराफेरी में कई फैसले सिर्फ कागजी रिकॉर्ड के आधार पर हुए। मौके की वास्तविक स्थिति का आकलन नहीं किया। वर्षों से आबाद गांव और कॉलोनियां बाद में मास्टर प्लान, ग्रीन जोन और इको सेंसिटिव जोन की सीमाओं में आ गईं। गोरेला गांव बड़ा उदाहरण है। गांव वर्षों पहले बस चुका था, पर यूडीए सीमा में शामिल होने और बाद में इको सेंसिटिव क्षेत्र घोषित होने से अब बड़ी संख्या में लोगों को पट्टे नहीं मिल रहे। कई परिवार मकानों का विस्तार तक नहीं कर पा रहे हैं। इसी तरह बड़ी, कोडियात, बुझड़ा, वरड़ा सहित कई क्षेत्रों में लोग वर्षों से नियमन की आस लगाए बैठे हैं।

तालाबों के जलभराव क्षेत्र में भी बस गईं कॉलोनियां

रूपसागर ही नहीं, बल्कि तीतरड़ा, फूटा तालाब, जोगी तालाब, नेला तालाब, भुवाणा और मांडल सहित कई जलभराव क्षेत्रों में समय के साथ कॉलोनियां बस गई। यदि ये क्षेत्र संवेदनशील थे तो शुरुआती दौर में निर्माण क्यों नहीं रोका। आज हजारों परिवार उसी प्रशासनिक लापरवाही की कीमत चुका रहे हैं। इन कॉलोनियों के नियमन और पट्टों का मुद्दा कई बार जनप्रतिनिधियों ने मुख्यमंत्री और जयपुर मुख्यालय तक उठाया जा चुका है। अनेक शिविर लगाए, आवेदन लिए, पर ज्यादातर मामलों में फाइलें कानूनी और तकनीकी आपत्तियों में उलझकर रह गईं। नतीजा शहर के हर कोने में कोई न कोई कॉलोनी ऐसी है, जहां लोग वर्षों से मूलभूत सुविधाओं और वैध पट्टों के इंतजार में हैं।